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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

प्रथमाननम् १९
'मिति व्यवहारे बाधकं नास्तीति वाच्यम्। 'मूले महीरुहो विहंगम-
संयोगी, न शाखायाम्' इति प्रतीतेरिवेदं पद्यं पूर्वार्धे काव्यमुत्तरार्धे तु न
काव्यमिति स्वरसवाहिनो विश्वजनीनानुभवस्य विरहादव्याप्यवृत्तिताया
अत एव स्वाधिकरणनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वमव्याप्यवृत्तित्वमिति परिष्कुर्वन्ति।
यस्याभावः स प्रतियोगी। अत्र वेदान्तमते यद्यपि शाखाविशेषस्यैवाधिकरणत्वं न तु
तद्वतो वृक्षस्येति संयोगो नाव्‍याप्यवृत्ति तथापि वृक्षः कपिसंयोगीत्यादिप्रतीतेर्वृक्ष
एवाधिकरणं कपिसंयोगस्य, शाखादिस्त्वधिकरणतावच्छेदक एव, शाखादौ सप्तम्यु-
पत्तिश्चाधिकरणतावच्छेदकेऽधिकरणत्वारोपात् 'शरीरे मे वेदना' इति वदिति
न्यायमतेन शङ्कासमाधाने बोद्धव्ये। तदेवं काव्यत्वस्याप्यव्याप्यवृत्तितया तस्य चैकत्रै-
वाधिकरणे पद्ये भावाऽभावयोरधिकरणताऽवच्छेदकभेदेन विरोधाऽभावान्न दुष्टं
काव्यमिदं पद्यमित्यत्र पद्ये काव्यपददुष्टपदार्थान्वये बाधः। समानविषयत्वे हि
विरोधः, विरोधे च दुर्बलं बलीयसा बाध्यते वस्तुतः। प्रकृते तु काव्यत्वस्य दोषरहितां-
शावच्छेदेन दुष्टत्वस्य च तदितरांशाऽवच्छेदेनैकत पद्ये सत्त्वेप्यधिकरणतावच्छेदक-
भेदेन समानविषयत्वाभावान्न विरोधः, विरोधाभावाच्च न तदुभयान्वये बाध्यबाधक-
भाव इत्यस्मन्मतेऽपि नानुषपत्तिरुक्तव्यवहारस्येति शङ्कार्थः। ये त्वत्र शङ्काग्रन्थं
दोषमात्रेऽव्याप्यवृत्तित्वपरं व्याचक्षते ते न युक्ताः, दोषस्य तथात्वेऽपि केवलं तदव्याप्य-
उक्त व्यवहार में जो वाक्य दोषयुक्त होने से काव्य नहीं है किन्तु दोषरहितत्व से
भिन्न काव्यलक्षणों के सम्बन्ध के कारण काव्यवत् प्रतीत-काव्याभास है उसी के लिए
काव्य शब्द का वक्ता के द्वारा लाक्षणिक प्रयोग हुआ है—यह कथन भी अनुचित है,
क्योंकि मुख्यार्थबाध के बिना लक्षणा नहीं मानी जा सकती। 'न्यक्कारो ह्ययमेव मे
यदरयः' इत्यादि पद्य में विधेयाऽविमर्श दोष रहने पर भी काव्यत्व ध्वनिकारादि-
सम्मत है। एवञ्च काव्यात्मक पद्य के लिए दोषयुक्त होना भी सम्भव है। ऐसी दशा
में काव्य शब्द के मुख्यार्थ के साथ 'दुष्ट' शब्दार्थ के अन्वय में किसी बाधा के
न रहने से उक्त व्यवहार में काव्य शब्द को लाक्षणिक कहना असंगत है। साथ ही,
यह लक्षणा रूढिमूला तो है नहीं और कोई प्रयोजनविशेष भी इसमें नहीं दिखता।
इस प्रसङ्ग से यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक ही वृक्ष में अंशविशेष में
पक्षिसंयोग और अंशान्तर में पक्षिसंयोगाभाव के समान एक ही पद्य में अंशविशेष
में दोष और निर्दुष्ट अंशान्तर में काव्यत्व होने से 'वृक्षः पक्षिसंयोगी तदभाववांश्च'
के समान 'इदं पद्यं दुष्टं काव्यं (च)' इस व्यवहार में कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि
'मूले वृक्षः पक्षिसंयोगी, न शाखायाम्' इस प्रामाणिक प्रतीति के आधार पर वृक्ष में
अंशविशेष मे पक्षिसंयोग और अंशान्तर मे पक्षिसंयोगाभाव से संयोग के अव्याप्य-
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