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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 414 में से

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पृष्ठ 49

ऽभावादिपरे ‘गतोऽस्तमर्कः’ इत्यादौ चाव्याप्त्यापत्तेः । न चेदमकाव्य-
मिति शक्यं वदितुम्, काव्यतया पराभिमतस्यापि तथा वक्तुं शक्य-
व्यङ्ग्यो भवितुमर्हत्येव । एवमग्रेऽपि यथासम्भवं व्यङ्ग्यार्था ऊहनीयाः । विरहिण्यादी-
त्यादिशब्देन यथासम्भवं सख्यादीनां ग्रहणम् । जीवनाऽभावादीत्यादिशब्देन च यथा-
यथं रमणागमनकालादिः संग्राह्यः । इत्यादावित्यतः परं गुणालंकारादिरहित इति
पूरणीयम् । अव्याप्तिश्चात्र काव्यलक्षणस्य गुणालङ्कारादिघटितस्य । अत्रालङ्काराभा-
वप्रतिपादनेन हेत्वलङ्कारः पण्डितराजाऽभिमतो नेति ज्ञायते । नाप्यत्र दोषाऽभावोऽपि,
उभयत्रैव विधेयाऽविमर्शस्य सत्त्वादित्यपि बोध्यम् । किञ्चैवं लक्षणेऽलङ्कारदोषा-
भाववत्यपि गुणहीने काव्येऽव्याप्तिः । एवमेवैकस्यचनाभावे तदितरसत्त्वेऽप्यन्याप्तिरि-
त्यपि विवेचनीयम् । न चेदमित्यनेन भामहाद्युक्तिं निरस्यतीति पूर्वमेवोक्तम् ।
वदितुमिति । काव्यत्वहेतुभूतस्य चमत्कारस्य तत्र सत्त्वान तद्विपर्यये युक्त्यभावा-
दित्यर्थः । युक्तिं विनाऽप्यकाव्यत्वाङ्गीकारे त्वाह—काव्यतयेत्यादिना । पराभिम-
मतस्य = प्रकाशकाराद्यभिमतकाव्यविषये । तथा = अकाव्यमिति । गुणालङ्कारादि-
विशिष्टे तदविशिष्टे च चमत्कारिणि वाक्ये काव्यशब्दव्यवहारस्य प्रसिद्धत्वेन चमत्का-
रित्वमेवाऽव्यभिचारि काव्यजीवितम्, तच्च ‘उदितं मण्डलं विधोः’ इत्यादावपि
गई है वह भी उचित नहीं है, क्योंकि गुणालंकारादि से रहित होने पर भी 'उदित
मण्डलं विधोः' (चन्द्रोदय हो चुका) तथा 'गतोऽस्तमर्कः' (सूर्यास्त हो गया) आदि
काव्यों में उक्त लक्षण की अव्याप्ति हो जाएगी। इन वाक्यों का काव्यत्व तो प्रमाणित
है हीं, क्योंकि वक्तृ-बोद्धव्य आदि के वैशिष्ट्य के कारण इन वाक्यों में भी चमत्कार-
जनक व्यङ्ग्य अर्थ की बोधकता है। यदि प्रथम वाक्य दूती द्वारा अभिसारिका
को कहा गया हो तो इससे अभिसरण का विधान, अभिसारिका द्वारा दूती से कहे
जाने पर प्रकाशाधिक्य के कारण दूसरों द्वारा देखे जाने की सम्भावना से अभिसरण
का निषेध और विरहिणी द्वारा अपनी सखी या किसी अन्य अन्तरङ्ग व्यक्ति से कहे
जाने पर विरह की उत्कटता तथा रमण के आने के समय आदि व्यङ्ग्यार्थ प्रकट
होते ही हैं। इसी तरह दूसरे वाक्य से, दूती द्वारा अभिसारिका से कहे जाने पर,
अभिसरणकाल आदि व्यङ्ग्यार्थ की भी प्रतीति होती ही हैं। यथासम्भव अन्यान्य
चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ भी हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में इन काव्यों में गुणालङ्का-
रादिघटित काव्य-लक्षण की अव्याप्ति सुस्पष्ट है। अतः गुणालङ्कारादि का निवेश
अनुचित हैं। ये वाक्य काव्य हैं ही नहीं, अतः इनमें काव्य-लक्षण की अव्याप्ति इष्ट
है—यह तो कहा नहीं जा सकता, क्योंकि जब इनसे चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ
का प्रतिपादन होता है तो फिर इन्हे काव्य न कहना सम्भव नहीं। अन्यथा प्राचीन-