रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १५
यत्त्वास्वादोद्बोधकत्वमेव काव्यत्वप्रयोजकं तच्च शब्दे चार्थे चाविशिष्ट-
मित्याहुः, तन्न। रागस्यापि रसव्यञ्जकताया ध्वनिकारादिसकलालंकारिक-
संमतत्वेन प्रकृते लक्षणीयत्वापत्तेः। किं बहुना, नाट्याङ्गानां सर्वेषामपि
प्रायशस्तथात्वेन तत्त्वापत्तिर्दुर्वारैव। एतेन रसोद्बोधसमर्थस्यैवात्र लक्ष्यत्व-
मित्यपि परास्तम्।
अपि च काव्यपदप्रवृत्तिनिमित्तं शब्दार्थयोर्व्यासक्तम्, प्रत्येकपर्याप्तं वा ?
नाद्यः, एको न द्वाविति व्यवहारस्येव श्लोकवाक्यं न काव्यमिति व्यवहार-
स्यापत्तेः। न द्वितीयः, एकस्मिन्पद्ये काव्यद्वयव्यवहारापत्तेः। तस्माद्वेद-
शास्त्रपुराणलक्षणस्येव काव्यलक्षणस्यापि शब्दनिष्ठतैवोचिता।
घटकत्वम्। प्रायश इत्यनेन क्वचिन्नेपथ्यविधानादौ रसोद्बोधकत्वाभावः सूचितः।
तत्त्वापत्तिः = काव्यत्वापत्तिः। एतेन = रसोद्बोधकत्वस्याऽतिप्रसक्तत्वेन।
प्राचीनोक्तलक्षणे दोषान्तरमाह—अपि चेति। प्रवृत्तिनिमित्तम् = काव्यत्वम्।
व्यासज्यवृत्तीति। पर्याप्तिसम्बन्धेनानेकाधिकरणेष्ववस्थितं व्यासज्यवृत्तीत्युच्यते।
यथा द्वित्वसंख्या समवायेन प्रत्येकं वर्त्तमानाऽपि पर्याप्तिसम्बन्धेन द्वयोरेव वर्त्तते, नै-
कत्र। यस्य च सम्बन्धः स तत्प्रतियोगी, यत्र च सम्बन्धः सोऽनुयोगी तस्य सम्बन्धस्य।
द्वित्वस्य पर्याप्तिर्द्वयोरिति द्वित्वं पर्याप्तिप्रतियोगि, द्रव्ये चानुयोगिनी। एवं त्रित्वा-
दिष्वपि बोध्यम्। अत एवैकत्वाऽनवच्छिन्नानुयोगिताकपर्याप्तिप्रतियोगित्वं व्यासज्य-
वृत्तित्वमुच्यते। एतद्विपर्ययेण चैकत्वाऽवच्छिन्नानुयोगिताकपर्याप्तिप्रतियोगित्वं
प्रत्येकपर्याप्तत्वमुच्यते। काव्यत्वस्य व्यासज्यवृत्तित्वे दोषमाह—नाद्य इत्यादिना।
द्वितीये दोषमाह—न द्वितीय इत्यादिना। काव्यद्वयेति। एकं काव्यत्वं शब्दे, अपरं
च तदर्थे इति द्वित्वं काव्यत्वस्येति तदाधारभूतकाव्यस्याऽपि द्वित्वमित्यर्थः। प्रकृतमु-
अलौकिक आस्वाद (रस) का उद्बोधक ही काव्य है, अतः शब्द और अर्थ दोनों
ही काव्य हैं, क्योंकि उक्त आस्वादोद्बोधकता दोनों ही मे समानरूप से है-ऐसा कुछ
लोग कहते। किन्तु यह भी असंगत है। कारण है कि तब तो राग को भी काव्य-
लक्षण मे समाविष्ट करना होगा, क्योंकि राग को भी ध्वनिकार आदि सभी
आलङ्कारिकों ने रसोद्बोधक माना ही है। एवञ्च उक्त लक्षण मे न्यूनता आ जाएगी।
अधिक कहने की आवश्यकता नहीं, उक्त मत की असंगति के लिए इतना ही कहना
पर्याप्त होगा कि उसके अनुसार तो बहुत से नाट्याङ्गों के भी रसोद्बोधक होने से
उन्हें भी लक्षण मे समाविष्ट करना पड़ जाएगा। अतः उक्त पक्ष अश्रद्धेय है। इसी
से 'रसोद्बोधसमर्थ तत्त्व ही काव्यलक्षण का लक्ष्य है' यह मत भी निरस्त हो जाता;
क्योंकि उक्त न्यूनता इस मत मे भी पूर्ववत् बनी हुई है।
इस प्रसङ्ग मे यह भी विचारणीय है कि काव्य शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त काव्यत्व