रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमस्याननम् ३७१
कत्वं नास्तीत्यस्ति नियमः, रसानये व्यभिचारात् । इत्थं च स्वस्वव्यञ्जको-
पनीतानां गुणिनां, गुणानाम् उदासीनानां च यथा परस्परोपश्लेषेणौदासीन्येन
वा तत्तत्प्रमितिगोचरता तथा रसानां तद्गुणानां चाभिव्यक्तिविषयतेति
नव्याः ।
ननु गुणो नाम गुण्याश्रित एव, नहि गुणिनं विना गुणस्य स्थितिरपि सम्भवति ।
तस्माद् गुणिनः पटादेः सत्त्व एव गुणस्य रक्तादेरभिव्यक्तिः सम्भवति । अत एवात्रापि
गुणिनं रसमभिव्यज्यैव रचनादिद्वारा गुणस्य माधुर्यादैरभिव्यञ्जकता सम्भवतीति शङ्का ।
समाधानन्तु व्यवहारेण नायं नियमः सिद्ध्यति—इन्द्रियत्रये घ्राण-श्रोत्र-जिह्वासु व्यभि-
चाराद् व्यतिक्रमात् । घ्राणेन्द्रियेण हि गुणस्य गन्धस्यैवाभिव्यक्तिर्न तु गुणिनः पृथिव्यादेः,
श्रोत्रेण शब्दस्यैवाभिव्यक्तिर्नकाशादेः, जिह्वया रसस्यैवाभिव्यक्तिर्न जलादेः । एवमेव
रचनादिना गुणस्यैव, न तु गुणिनो रसादेरभिव्यक्तिरिति ।
इत्थमिति । गुणानां गुणिनाञ्च स्वतन्तरूपेणाभिव्यङ्ग्यत्वे स्थिते सतीत्यर्थं ।
स्वस्वव्यञ्जकैः चक्षुरादिभिः उपनीतानाम् उपस्थापितानां गुणिनां पृथिव्यादीनां, घ्राणा-
दिभिर्गुणानां गन्धादीनाम्, श्रोत्रादिभिः उदासीनानां गुणगुणिभावरहितानां शब्दादीनाञ्च
परस्परमन्वयेन विशेष्यविशेषणभावेन, उदासीनतया तटस्थभावेन वा एकविषयकज्ञान-
गोचरता भवति । एवमेव वर्णरचनादिभिरुपनीतानां माधुर्यादिगुणानां पदवाक्यगुणा-
वर्ण-रचनादि को भो रसव्याञ्जक मानने से व्यंजकों की संख्या बढ़ जाती है और इसके
व्यञ्जक मानने में कोई प्रमाण भी नहीं है ।
यहाँ शंका होती है कि वर्णरचना को माधुर्य आदि गुणों का व्यञ्जक मानना
तो सर्वसम्मत ही है, तत्र तो इन गुणों के आश्रय (गुणी) रसादियों के भी व्यञ्जक इसी
को मानना होगा, क्योंकि गुणी ( आश्रय ) के प्रकटित होने के बिना गुण ( आश्रित )
की अभिव्यक्ति उचित नहीं है ( वस्त्र के बिना उसके गुण लाल आदि का दृष्ट होना
संभव नहीं है ) । इसके समाधान में कहते हैं कि बात तो यथार्थ है, पर यह बात
अनिवार्य नहीं है, सब जगह लागू नहीं होती है; क्योंकि कान, जिह्वा एवं नासिका
इन तीनों इन्द्रियों में इस नियम का व्यभिचार (लागू न होना) देखा जाता है । कान से
शब्दगुण का तो प्रत्यक्ष होता है पर उसके आश्रय आकाश का नहीं, जीभ से मधुरादि
गुण का ही, उसके आश्रय जल का नहीं; नाक से गन्ध का ही, उसके आश्रय पृथिव्यादि
का नहीं । पृथिव्यादि का तो अन्य इन्द्रिय ( आँख ) से ही प्रत्यक्ष होता है ।
इस प्रकार अपने-अपने स्वतन्त्र व्यञ्जकों से गुण, गुणी एवं उदासीन ( गुण-
गुणिभाव-रहित ) के व्यंग्य होने पर आपस में मिलकर या न मिलकर जैसे उन-उन
( समुदित ) अर्थों का प्रत्यक्ष कराना दृष्ट है उसी प्रकार रस एवं माधुर्यादि गुणों की
अभिव्यक्ति होती है । अर्थात् रचनादि रस आदि के व्यञ्जक नहीं हैं—ऐसा नवीन
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