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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 400

३६८ रसगङ्गाधरः
तदित्थं निरूपितस्यास्य रसादिध्वनिप्रपञ्चस्य पदवर्णरचना-वाक्य-
प्रबन्धैः पदैकदेशैरवर्णात्मकै रागादिभिश्चाभिव्यक्तिमामनन्ति । तत्र वाक्य-
गतानां पदानां सर्वेषामपि स्वार्थोपस्थितिद्वारा वाक्यार्थज्ञानोपाये समानेऽपि
यत्तु "नहि विभावादीत्यारभ्य मर्मप्रकाशोऽशुद्धः प्रतिभाति" इति रसचन्द्रिका-
यामुक्तं तत्तु सूक्ष्मेक्षिकया गूढभावानाकलनजन्यमेव । विभावज्ञानात्पूर्वमेव वाच्यप्रकरणा-
दिप्रतीतौ क्रमोऽनुभूयते, न तत्र विगलितवेद्यान्तरता सहृदयैरनुभूयते, सप्रकरण-वाच्यार्थ-
प्रतीत्यनन्तरं तत्क्षणमेव विभावादिज्ञानं जायते यत्र विगलितवेद्यान्तरता, तत्र नैव
क्रमोऽनुभूयते । मर्मप्रकाशे 'तत्क्रमग्रहणे' इत्यस्य वाच्यार्थक्रमग्रहण इत्यर्थः ।
पूर्वोक्तेषु त्रिष्वपि मतेषु द्वितीये मते एव पूर्वाचार्यग्रन्थसमन्वयो भवति । परन्तु
भावध्वनेः संलक्ष्यक्रमे वस्तुध्वनौ, असंलक्ष्यक्रमे तु रसध्वनौ स्थापनं नैव युक्तं, भावानां
'वस्तुतः' पार्थक्यस्य सर्वसम्मतत्वात्, रत्यादीनां विभावादिसामग्रीसमवेतानां न रसत्व-
मित्यपि नैव सहृदयसम्मतमित्यस्यापि प्रसिद्धत्वात्, विभावादि-रसबोधक-सामग्रीगत-
क्रमस्य क्वाप्यदृष्टत्वाच्च रसस्थल इव भावादिस्थलस्य तुल्यत्वाच्चेति तृतीयमतमेव
समर्थयामहे ।
तदित्थमिति । प्रपञ्चः समुदायः । पदं = सुबन्तं तिङन्तं च । वर्णा अकारा-
दयः, रचना वर्ण-पदोपस्थापनरीतिः, वाक्यं क्रियान्वितपरस्परसाकांक्षपदसमुदायः,
प्रबन्धो महावाक्यं मेघदूतादि, पदैकदेशः प्रकृतिः प्रत्ययो वा, अवर्णात्मको वीणादि-
प्रतीति होती है, जिसमें क्रम अलक्षित रहता है। अतः इसे अलक्ष्यक्रमव्यंग्य ही कहते हैं,
संलक्ष्यक्रम नहीं । वाच्यार्थ के क्रम को लेकर रत्यादि को संलक्ष्यक्रम नहीं कह सकते,
क्योंकि विभावादि ज्ञान से रहित यत्किंचित् वाच्यार्थ ( वाच्यार्थ के अंश ) से रस-
प्रतीति नहीं हो सकती है। अतः "तल्पगतापि च सुतनुः" इस उदाहरण में अलक्ष्यक्रम-
व्यंग्य ही है। वहाँ व्यञ्जक के अवयव में ही क्रम है। व्यञ्जक और व्यंग्य के ज्ञान में
क्रम अलक्षित ही है। अतः रसभावादि ध्वनि सर्वत्र अलक्ष्यक्रम ही होते हैं। अभिनव-
गुप्त ने वाच्यार्थगत क्रम को लेकर रत्यादि को जो संलक्ष्यक्रम कहा है सो आरोपितरूप
से ही यथाकथंचित् माना जा सकता है।
रस-भावादिध्वनि के विषय में ऊपर तीन मत प्रदर्शित हुए—( १ ) प्रस्फुट
प्रकरण में रसादिध्वनि संलक्ष्यक्रम होते हैं—यह पण्डितराज का मत है। ( २ ) अस्फुट
प्रकरण में रत्यादि वस्तुमात्र रह जाते हैं, रस नहीं—यह आनन्दवर्धन एवं अभिनवगुप्त
का मत है। ( ३ ) रसादिध्वनि सदा अलक्ष्यक्रम ही होते हैं—यह नागेश का मत है।
अब रसादिध्वनि के व्यंजकों के विषय में प्राचीन एवं नवीन विद्वानों के मत
निरूपित करते हुए पहले प्राचीनों का मत प्रस्तुत कर रहे हैं। तो इस प्रकार निरूपित
रसभावादि ध्वनियों के समुदायों का पद, वर्ण, रचना ( वैदर्भी आदि रीति ), वाक्य,