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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 414 में से

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पृष्ठ 398

झगिति जायमानालौकिक-चमत्कारविषयस्थायित्वम् । संलक्ष्यक्रमतया व्यज्य-
मानस्य रत्यादेस्तु वस्तुमात्रतैव, न रसादित्वमिति तेषामाशयस्य वर्णनेन न
पूर्वाचार्यसंमत्या साधिता । अथवा यथाभिनवगुप्तमते स्वोक्तिविरोधपरिहाराय रसपदस्य
रत्यादिस्थायिभावपरतोक्ता तथैव स्वमतेऽपि ! युक्तञ्चैतत्, पूर्वप्रतिज्ञावाक्ये रसादीत्यनुक्त्वा
"स्थाय्यादीनामपि संलक्ष्यक्रमत्वम्" इत्येव हि पण्डितराजेनोक्तम्, भेदगणनप्रस्तावे च
रसगङ्गाधरे नैव रसध्वनिः संलक्ष्यक्रमत्वेन परिगणितः । तेन अत्रोच्यत इत्यस्य
मयेति शेषः ।
प्रकटैरिति । स्फुटप्रकरणे सुव्यक्ते विभावादौ या रतिः प्रतीयते सा अक्रमतयैव,
सैव रसस्वरूपतां याति, अलक्ष्यक्रमसंज्ञा च लभते । या हि रतिः ( भावमात्रम् ) स्वबोधे
क्रममपेक्षते सा केवलं रतिस्वरूपा, न तु रसस्वरूपा । तस्या वस्तुध्वनावेवान्तर्भाव इति ।
रसीभवतीति, अरसो रसः सम्पद्यत इति अभूततद्भावे च्विप्रत्यये दीर्धे च सिद्धयति ।
नहि स्थायिभावा एव रसा अपि तु अलक्ष्यक्रमा एव, संलक्ष्यक्रमास्तु वस्तुरूपाः ।
झगिति अविलम्बेन । तदुक्तीनाम् आनन्दवर्धनाभिनवगुप्तपादानाम् । स्थाय्यादीनां संलक्ष्य-
क्रमत्वकथनेऽपि संलक्ष्यक्रमभेदगणने तदनुपादानमिति विरोधः, स्थाय्यादीनां वस्तुध्वना-
वन्तर्भाव इति समाधानम् ।
विभाव एवं रस की प्रतीति में क्रम लक्षित नहीं होता है) । स्थायीभाव जो रस नहीं
हैं, वे रस तब बनते हैं जब अतिशीघ्र उत्पन्न अलौकिक चमत्कार के विषय बनते हैं ।
जहाँ उक्त चमत्कार देर से उत्पन्न होता है वहाँ संलक्ष्यक्रम ( क्रम का लक्षित होना )
रूप से व्यंग्य होते हुए रति आदि स्थायीभाव या व्यभिचारीभाव भी वस्तुमात्र बनकर
रह जाते हैं, अर्थात् रत्यादि वहाँ रस नहीं बन पाते हैं—इस प्रकार से उन लोगों
( अभिनवगुप्त आदि ) के आशय को वर्णित करने पर उनकी उपर्युक्त उक्तियों ( "द्वादश
भेदाः" ) से विरोध नहीं होता है । परन्तु ऐसा समाधान करने में कोई युक्ति होनी
चाहिए, जो काव्यतत्त्व के मर्मज्ञ विद्वानों को विचारना चाहिए । ( इसके बाद अभी
युक्ति दिखायी जायगी । )
अब शंका होती है कि संलक्ष्यक्रम स्थल में यदि रत्यादि रस नहीं बनते,
वस्तुमात्र रहते हैं तो अभिनवगुप्त ने जो पूर्व में "रसभावादि सब जगह अलक्ष्यक्रम ही
नहीं रहते" ऐसा कहा है और जगन्नाथ ने स्वयं "सभी रसादिलक्षण" ऐसा जो कहा
है वह असंगत हो जाता है । इसका समाधान करते हैं कि वहाँ रस शब्द रत्यादि भाव
अर्थ में लाक्षणिक ( लक्षणा से बोधक ) है ।
नागेशभट्ट ने उपर्युक्त समाधान में अपेक्षित युक्ति ( उपपत्ति ) प्रस्तुत की है
और एक नवीनमत को भी 'गुरुमर्मप्रकाश' में रखा है। युक्ति यह है कि रस को