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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 397

प्रथमाननम् ३६५
त्मक" इति मम्मटोक्तिश्च न सङ्गच्छेत वस्तुवलङ्कारात्मना द्विविधेन वाच्येन
स्वतःसम्भवि त्व-कविप्रौढोक्तिनिष्पन्नत्व-कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिनिष्पन्नत्वैस्त्रिभि-
रुपाधिभिस्त्रैविध्यमापन्नेन षडात्मना वस्तुवलङ्कारयोरिव रसादेरप्यभिव्यञ्जनाद्
अष्टादशत्वप्रसङ्गात् ।
अत्रोच्यते—प्रकटैर्विभावानुभावव्यभिचारिभिरलक्ष्यक्रमतयैव व्यज्य-
मानो रत्यादिः स्थायिभावो रसीभवति, न संलक्ष्यक्रमतया । रसीभावो हि नाम
विषये "व्यंग्यक्रमलक्ष्यत्वादेवानुरणनरूपो यो व्यङ्ग्य" इत्याह । वस्तुवलङ्कारयोरि-
वेति । संलक्ष्यक्रमध्वनौ वस्तु अलङ्कारश्चेति द्वावेव व्यङ्ग्यौ न रसादिरिति सिद्धयति
'द्वादशात्मक' इति कथनेन । तथा हि वाच्यस्वरूपी वस्तुवलङ्कारो व्यञ्जको स्वतः-
सम्भवि-कविप्रौढोक्तिसिद्ध-कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्धेति भेदैः त्रिविधौ । तथा च
व्यञ्जकाः षट् । तैर्व्यञ्जकैर्वस्त्वलङ्कारयोर्व्यङ्ग्यत्वेन द्वादशात्मकता संलक्ष्यक्रमध्वनेः
सिद्धा । रसादिध्वनेरपि सम्मेलनेन पूर्वोक्तषड्व्यञ्जकद्वारा तस्यापि षड्विधस्य व्यंग्यस्य
सम्भव इति साकल्येन अष्टादशभेदाः कथयितुमुचिताः, किन्तु द्वादशात्मकत्वमेव कथित-
मिति मान्याचार्यसिद्धान्तविरोधः कथं परिहरणीय इत्याक्षेपः ।
समाधत्ते—अत्रोच्यत इति । केनचिदाचार्येणेति शेषो, न तु मयेति । स्वमतेन
तु आक्षेपो युक्त एवेत्यत्रत्य-सन्दर्भेण प्रतिभाति । पण्डितराजेन "उपपादयिष्यते च
स्थाय्यादीनामपि संलक्ष्यक्रमत्वम्", "सोऽयं निगदितः सर्वोऽपि रसादिलक्षणो व्यङ्ग्य-
प्रपञ्चः••••••संलक्ष्यक्रमोऽप्येष भवति" इत्यादि सन्दर्भेण रसभावादिध्वनेः संलक्ष्यक्रमता
रसध्वनि का समावेश नहीं करते) क्योंकि वस्तु और अलंकार रूप वाच्य अर्थ के तीन-
तीन उपाधि ( धर्म·या स्वभाव ) स्वतःसम्भवी, कविप्रौढोक्तिसिद्ध एवं कविनिबद्ध-
वक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध के मिलाकर छः व्यञ्जक ( व्यंग्यार्थ के साधक ) हुए। इन छः
व्यञ्जकों के द्वारा व्यंग्य वस्तु एवं अलंकार को लेकर संलक्ष्यक्रमध्वनि के बारह भेद
होते हैं। अब यदि रस को भी ले लिया जाय तो उक्त छः व्यंजकों से व्यंग्य रसध्वनि
के छः भेद इसके बढ़ जाने से इन आचार्यों को बारह के स्थान में अठारह कहना
चाहिए।
ज्ञातव्य है कि यह आक्षेप रसध्वनि को संलक्ष्यक्रम भी मानने वाले अभिनवगुप्त
एवं जगन्नाथ पर ही लगता है, मम्मट पर नहीं, क्योंकि उन्होंने रसध्वनि को कहीं भी
संलक्ष्यक्रम कहा ही नहीं है। यहाँ अपने मत में मम्मट से विरोध रूप आपत्ति होने का
ही आक्षेप है।
उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं—जहाँ विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-
भाव व्यक्त ( स्पष्ट ) रहते हैं वहाँ तो अलक्ष्यक्रमरूप से ही व्यंग्यार्थ होते हुए रति
आदि स्थायीभाव रस बन जाते हैं, संलक्ष्यक्रमरूप से नहीं ( क्योंकि वहाँ वाच्यार्थ