रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३६३
समयेन प्रतीयत इति हेतुहेतुमतोः पौर्वापर्यक्रमस्यालक्षणाद् अलक्ष्यक्रमो व्यप-
दिश्यते । यत्र तु विचारवेद्यं प्रकरणम्, उन्नेया वा विभावादयस्तत्र सामग्री-
विलम्बाधीनं चमत्कृतेर्मान्थर्यमिति संलक्ष्यक्रमोऽप्येष भवति । यथा—"तल्प-
गतापि च सुतनुः" इति प्रागुदाहृते पद्ये 'सम्प्रति'-इत्येतदर्थावगतिविलम्बेन ।
न खलु धर्मिग्राहकमान-सिद्धं रत्यादिध्वनेरसंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यत्वम् । अत एव
लक्ष्यक्रमप्रसङ्गे—
एवंवादिनि देवर्षौ पार्श्वे पितुरधोमुखी ।
लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥
वाच्यार्थ-लक्ष्यार्थ-प्रकरण-विभावानुभावरूपाणां भावध्वनिबोधकोपकरणानां बोधे विलम्बः
स्वाभाविकः । मान्थर्यं मन्थरता विलम्बः । तेन तत्र भावध्वनिबोधे क्रमस्य अनुभवेन
तस्य संलक्ष्यक्रमतापि भवति ।
धर्मिग्राहकेति । अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यत्वं धर्मस्तदाश्रयो रत्यादिध्वनिर्धर्मी,
तद्ग्राहकाः तत्साधकाः सहृदया एवात्र मानं प्रमाणम् । तैः सहृदयैः आस्वादनमेव
क्रियते, न तु अलक्ष्यक्रमत्वं साध्यते, तत्तु बोधगताविलम्बित्त्वेनैव साध्यते, तदभावे भाव-
ध्वनेः संलक्ष्यक्रमता स्वतःसिद्धैवेति भावः ।
अत एवेति । रत्यादिध्वनेः संलक्ष्यक्रमत्वस्यापि सत्त्वादेव । स्वोक्तौ परममान्या-
चार्ययोरानन्दवर्धनाभियुक्तयोः सम्मतिं प्रकाशयत्यत एवेति सन्दर्भेण । एवंवादिनीति ।
प्रतीति न होने के कारण ) अलक्ष्यक्रम कहे जाते हैं । किन्तु जहाँ प्रकरण ( प्रसङ्ग )
का ज्ञान कुछ सोचने के बाद होता है या विभाव आदि का ऊह करना पड़ता है वहाँ
रसप्रतीति में अपेक्षित सामग्री ( साधनों ) के ज्ञान में विलम्ब के कारण चमत्कार
मन्द पड़ जाता है और इसलिए यह रस, भाव आदि संलक्ष्यक्रम ध्वनि भी हो जाता है,
क्योंकि वहाँ वाच्य-लक्ष्य-प्रकरण-विभाव-अनुभाव आदि के क्रम प्रतीत होते हैं । यथा—
उत्तमोत्तम काव्य के उदाहरण में दिये गये "तल्पगतापि" इस पद्य मे 'अभी' इस अर्थ
की प्रतीति विलम्ब से होती है । ( इस मुग्धा को पहले लज्जा अधिक थी, पर अभी
भावी वियोग के कारण वह कम हो गयी है—ऐसा अर्थ प्रकरणज्ञान-सापेक्ष होने के
कारण विलम्ब से होता है । अतः यहाँ का शृङ्गार रसध्वनि संलक्ष्यक्रमव्यंग्य है ) ।
रस अलक्ष्यक्रमव्यंग्य ही हो ऐसा कोई नियम नहीं हैं, क्योंकि अलक्ष्यक्रम-
व्यङ्ग्यत्व रूप धर्म ( भाव ) का धर्मी ( आश्रय ) रस के ग्राहक ( ग्रहण करने वाले
सहृदय ) ही इसके संलक्ष्यक्रमत्व या असंलक्ष्यक्रमत्व में प्रमाण हैं, वे यह नहीं कहते
कि रस अलक्ष्यक्रमव्यंग्य ही है । इसलिए रस लक्ष्यक्रमव्यंग्य भी होता है । अतएव
संलक्ष्यक्रमव्यंग्य के प्रसंग में आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक में कहा है कि—
'इस प्रकार देवर्षि अङ्गिरा के बोलने पर पिता के पास बैठी हुई पार्वती
नीचा मुंह करके खेलने के लिए हाथ में स्थित कमल की पत्तियों को गिनने लगीं' ।