रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ रसगङ्गाधरः
रसस्य तु स्थायिमूलकत्वात् प्रशमादेरसम्भवः, सम्भवे वा न चमत्कार
इति स न विचार्यते।
( अलक्ष्यक्रमव्यंग्यध्वनि-विचारः )
सोऽयं निगदितः सर्वोऽपि रत्यादिलक्षणो व्यङ्ग्यप्रपञ्चः स्फुटप्रकरणे
झगिति प्रतीतेषु विभावानुभावव्यभिचारिषु सहृदयतमेन प्रमात्रा सूक्ष्मेणैव
केवलं तत्तद्भावरूपत्वमेव वा प्रकारो विशेषणम्। अन्यत्र = भावशान्त्यादौ भावत्वेन
सह प्रशमावस्थात्वादिरपि विशेषणम्।
यथा भावस्य प्रशमादिर्भवति, तथैव रसस्यापि कथं न भवतीत्याह—
रसस्य त्विति। स्थायिभावमूलकत्वेन रसः सर्वदा नित्यत्वेन तिष्ठत्येवेति तस्य प्रशमो-
दयादयो न सम्भवन्ति। यदि तथापि तद्वर्णनं क्रियते, तर्हि तत्र न कश्चिच्चमत्कार-
सम्भावनेति।
पूर्वप्रतिज्ञातं “स्थाय्यादीनामपि संलक्ष्यक्रमव्यंग्यत्वमुपपादयिष्यत” इति भाव-
निरूपणानन्तरं प्राप्तावसरं प्रस्तौति—सोऽयमिति। सद्यः प्रतिपादितो रत्यादिलक्षणः =
स्थायिभावाः सञ्चारिभावाश्च, तेषां प्रपञ्चः = समुदायः। स्फुटप्रकरणे स्पष्टवेद्ये प्रकरणे।
झगिति = झटिति अविलम्बितेनैव। प्रमात्रा ज्ञात्रास्वादकपुरुषेण। हेतुहेतुमतो कारण-
कार्ययोः विभावादि-रसप्रतीतयोर्विद्यमानस्यापि क्रमस्य अलक्षणाद् अप्रतीतेः, शतपत्र-
भेदनवत् क्रमो नैव लक्ष्यत इति कारणाद् अलक्ष्यक्रम-नाम्ना मुख्यतया व्यवह्रियते, सर्वे
बुधाः रसभावध्वनिम लक्ष्यक्रमत्वेनैव प्रतिपादयन्ति। किन्तु यत्र विचारेण चिन्तनानन्तरं
ज्ञेयं प्रकरणं भवति, उन्नेया ऊहनीया वा विभावादयो भावानां कारणस्वरूपास्तत्र
तात्पर्य यह है कि भावों में केवल भावत्व रहता है, जब कि भावशान्त्यादि में शान्ति-
विशिष्ट भावत्व आदि। शुद्ध जल और बर्फ में जो अन्तर है, वही भाव और भाव-
शान्त्यादि में है। या मित्र के साथ-साथ रहने में जो आह्लाद होता है और उनके विदा,
आगमन आदि के समय होता है, इनमें जो अन्तर है वही भाव और भावशान्त्यादि में हैं।
रस तो स्थायीभावमूलक हैं, उनके सदा स्थायी रहने से उनका प्रशम, उदय
आदि होना सम्भव नहीं है। अथवा यदि सम्भव भी हो तो तद्गत कोई अलग से
चमत्कार नहीं होगा। अतः उसका विचार ही नहीं किया जा रहा है।
पूर्ववर्णित ये सभी रत्यादि स्थायीभाव, सञ्चारीभाव रस आदि जितने व्यङ्ग्य-
समुदाय हैं, वे सभी प्रकरण के स्पष्ट (व्यक्त) रहने पर विभाव, अनुभाव और
व्यभिचारीभाव के शीघ्र प्रतीत हो जाने से अत्यन्त सहृदय ज्ञाता के द्वारा अत्यल्प
समय में ही समझ लिये जाते हैं, जिससे कारण (विभावादि) और कार्य (रसप्रतीति)
के पूर्व-पर के क्रम के (कौन पहले और कौन बाद में—इसके) लक्षित न होने के कारण
(कार्य-कारण में क्रम रहने पर भी कमल के सौ पत्तियों को गुंथने के समान क्रम-