रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३६१
सहृदयानामनुचितेव । तस्माद् भावप्रशमादिष्वपि प्राधान्येन भावानामेव
चमत्कारित्वम्, प्रशमादेस्तूपसर्जनत्वम् । अतो न तस्य वाच्यतादोषः ।
इदं पुनर्भावध्वनिभ्यो भावशान्त्यादीनां चमत्कारवैलक्षण्ये निदानम्—
यदेकत्र चर्वणायां भावेषु स्थित्यवच्छिन्नमर्षादित्वम्, अमर्षादित्वमेव वा प्रकारः,
अन्यत्र तु प्रशमावस्थात्वादिरपीति ।
यदि नाम भावस्य नाशादेश्चोभयोर्व्यङ्ग्यत्व एव भावशान्त्यादिध्वनित्वं स्वी-
क्रियतेऽन एवात्र न ध्वनित्वमिति चेत् पूर्वोक्तभावशान्ति-भावोदयोदाहरणपद्ययोः शमो-
दययोर्वाच्यत्वेऽपि केवलभावगतव्यङ्ग्यत्वमादायापि ध्वनित्वव्यवहारः सर्वसम्मतोऽसङ्गतः
स्यात् ।
उपसर्जनत्वम् = विशेषणत्वेन गौणत्वम् ।
एकत्र = भावध्वनौ । स्थित्यवच्छिन्नेति = विद्यमानताविशिष्टामर्षादित्वम् ।
आप कहेंगे कि ध्वनि होने में भाव और शान्त्यादि दोनों का अवाच्य ( व्यंग्य ) रहना
अपेक्षित है, एक ही का नहीं, तो यह और अधिक आपत्तिजनक हो जायगा, क्योंकि
पूर्वोक्त दोनों पद्यों में "उपसि" में शान्ति के और "क्षमापण" में उदय के वाच्य न
रहने के कारण ये उदाहरण ही न रह सकेंगे, जबकि इनका उदाहरण होना सर्वसम्मत
है। अतः इस आपत्ति को आप इष्ट नहीं कह सकते, क्योंकि सहृदय इसे अनुचित ही
मानेंगे ।
अतः भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता में भी प्रधानतया
भावों में ही चमत्कार रहता है, शान्ति आदि तो गौण ही हैं । अतः उनके वाच्य रहने
पर भी भाव के व्यंग्य रहने से भावशान्त्यादि ध्वनि मानने में वाच्यता दोष नहीं
लगता है ।
और भावध्वनियों की अपेक्षा भावशान्ति आदि के चमत्कार में विलक्षणता
( फर्क ) का यह भी एक मूल कारण है कि एक ओर भावों के आस्वादन में स्थिति
रूप अवस्था वाले अमर्ष आदि रहते हैं ( पूर्व से ही भाव की स्थिति बनी रहती है ),
दूसरी ओर भावशान्त्यादि में प्रशमादि उन-उन अवस्था वाले ही अमर्षादि रहते हैं ।
इस प्रकार भावों के विशेषण के रूप में स्थिति रूप अवस्था-विशेष वाले अमर्षादि या
केवल अमर्षादि और भावशान्त्यादि के विशेषण ( प्रकार ) के रूप में प्रशमावस्थापन्न
आदि देख जा सकते हैं । भावों को प्रथम विशेषण युक्त रहने पर भी भावशान्त्यादि से
वैलक्षण्य नहीं होता है, क्योंकि अमर्षादि भी तब भाव-विशेष स्थित्यवस्थापन्न होते हैं
और भावशान्त्यादि भी प्रशमावस्थापन्न, उदयावस्थापन्न आदि भाव-विशेष ही होते हैं ।
अतः भावों को भावशान्त्यादि से विलक्षण दिखाने हेतु उसका प्रकार ( विशेषण )
अमर्षादित्व ( अमर्षत्व, असूयात्व आदि ) ही मानें, जिससे शुद्ध भावों का बोध होगा ।