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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 414 में से

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पृष्ठ 392

३६० रसगङ्गाधरः
निर्वासयन्तीं धृतिमङ्गनानां, शोभां हरेरेणदृशो धयन्त्याः ।
चिरापराधस्मृतिमांसलोऽपि, रोषः क्षणप्राघुणिको बभूव ॥
इत्यादावपि भावप्रशमध्वनित्वापत्तेः, भावस्य वाच्यत्वेऽपि प्रधानस्य
तत्प्रशमस्य व्यङ्ग्यत्वात् । उभयोरप्यवाच्यत्वमपेक्षितमिति चेत्, प्रागुक्तपद्यद्वये
शमत्वोदयत्वाभ्यां शमोदययोर्वाच्यत्वादनादाहरणत्वापत्तेः । इष्टापत्तिस्तु
नान्वयो नैव युक्तः । यदि बलादन्वयः इष्ट इत्युच्यते तर्हि पूर्वोक्तभावोदयोदाहरणपद्ये
“उषसि प्रतिपक्षे”त्यादौ नयनकोणयोररुणद्युतेरुदयो वर्णितो विरुद्धयेत, यतो हि अरुण-
द्युतिव्यङ्ग्यार्थोऽमर्षश्चित्तवृत्तित्वान्नेत्रकोणयोर्नैव स्थातुमर्हति । तस्माद् वाच्यार्थ-
व्यङ्ग्यार्थयोरन्वयो नोचितस्तथा सति पूर्वपक्षः सुदृढ इति नैव वक्तव्यमित्याह-मैवम्
इति । शान्त्यादेः प्राधान्ये स्वीकृते यत्र भावो वाच्यार्थः, शान्त्यादिस्तु व्यङ्ग्यस्तत्र
भावशान्त्यादिध्वनिरनिष्टोऽपि स्वीकृतव्य इत्यापत्तिः समापतति ।
तथाहि-निर्वासयन्तीमिति । अङ्गनानां गोपाङ्गनानां धृति धैर्यं निर्वास-
यन्तीं निस्सारयन्तीं हरेः श्रीकृष्णस्य शोभां सौन्दर्यं धयन्त्याः पिबन्त्या एणदृशो हरिण-
नयनायाः, चिरकालापराधानां स्मरणेन मांसलोऽपि परिपुष्टोऽपि रोषः अमर्षः क्षण-
मात्रस्य प्राघुणिकोऽतिथिः बभूव । हरिसौन्दर्याकृष्टाया रोषो विलीनोऽभूदिति भावः ।
अत्रामर्षभावो रोषपदवाच्य एव, तत्प्रशमस्तु क्षणप्राघुणिकशब्देन व्यज्यते । किन्त्वत्र
भावशान्तिध्वनिर्नेव स्वीक्रियते भावस्याव्यङ्ग्यत्वात् ।
सकेगा, क्योंकि लाली का अन्वय आँख से संभव है, पर उससे व्यंग्य अमर्ष तो चित्तवृत्ति
है, वह आँख में कैसे रहेगा ?
भाव को प्रधान कहने वाले उत्तरपक्षी कहते हैं कि शान्त्यादि को प्रधान
मानने वालों का ऐसा उपर्युक्त समाधान ठीक नहीं है, क्योंकि इस समाधान के बावजूद
भी अग्रिम पद्य में, जहाँ भावशान्तिध्वनि नहीं होता है, उसमें भी वह ध्वनि हो
जायगा-यह आपत्ति (दोष) अलग से खड़ी हो जाती है।
सुन्दरीयों के धैर्य को निकालती हुई हरि की शोभा का पान करती हुई (उन्हें
एकटक से देखती हुई) मृगनयना का रोष (अमर्ष) चिरकाल से हरि के द्वारा
अपराध (अन्य रमणी-अनुराग) करने के स्मरण से परिपुष्ट होने पर भी क्षणभर का
अतिथि हो गया (झट से भाग गया)।
इत्यादि पद्यों में भी भावशान्तिध्वनि की आपत्ति आ जायगी, क्योंकि यहाँ
भाव (अमर्ष) के वाच्यरूप में (रोषपद से) रहने पर भी उसके प्रशम जो आपके
मत से प्रधान ही है, वह तो व्यंग्य ही (क्षणप्राघुणिक शब्द से) हैं। (हमारे मत से
तो भाव प्रधान है, जिसके वाच्य रहने से ध्वनित्व का प्रसंग ही नहीं है।) यदि