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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 414 में से

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पृष्ठ 391

प्रथमाननम् ३५९
ननु शब्दवाच्यानां प्रशमादीनामरुणकान्त्यैवान्वयाद् अरुणकान्तिप्रश-
मादेरेव वाच्यत्वं पर्यवसितं, न तु तादृश-प्रशमादिव्यङ्ग्यस्य रोषप्रशमादेः,
व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभेदस्यावश्यकत्वात् । न चारुण्यव्यङ्ग्यरोषस्यैव वाच्यीभूत-
प्रशमान्वय इति वाच्यम्, वाच्य-व्यङ्ग्यप्रतीत्योरानुपूर्व्येण सिद्धतया वाच्या-
न्वयबोधवेलायां वाच्यैः सह व्यङ्ग्यान्वयानुपपत्तेः । अन्यथा 'मुदृशो नयनाब्ज-
कोणयोः' इत्यस्यानन्वयो न स्यात् । मैवम् । एवमपि—
कान्तयः शेमुः शान्तिं गताः । अत्रामर्षभावः शान्तिध्वनिः । नयनारुण्येनामर्षो व्यज्यते ।
शान्तिस्तु 'शेमुः' पदवाच्यैवेति ।
भावशान्त्यादौ शान्त्यादिप्राधान्यवादिमतं पोषयति—शब्देति । अस्तु शब्दवाच्यः
प्रशमादिः, किन्तु तस्यान्वयस्तु अरुणकान्त्यादिनैव, न तु रोषादिना । तथा च अरुण-
कान्त्यादिशम एव वाच्योऽर्थः, तेनार्थेन व्यङ्ग्योऽर्थो रोषप्रशमादिः । एवं हि रोषप्रश-
मादिर्न वाच्यार्थो व्यङ्ग्यार्थत्वात् । व्यञ्जको हि वाच्यार्थो व्यङ्ग्यार्थाद् भिन्न एव
सम्भवति । ततश्च रोषप्रशमादेर्व्यङ्ग्यार्थत्वे शान्तिप्राधान्येऽपि भावशान्तिध्वनित्वमक्षत-
मित्यभिप्रायः पूर्वपक्षिणः । उत्तरपक्षिणा कृतम् आक्षेपं समाधत्ते—न चेति । वाच्यार्थस्य
प्रशमादेरन्वयो नैवारुणकान्त्यादिना अपितु तद्व्यङ्ग्यरोषादिनैव । ततश्च वाच्येन शमेन
रोषादेरन्वयाद् ध्वनित्वाभावस्तस्य तदवस्थ एवेति नैव वाच्यम् । यतो हि पूर्वं वाच्यार्थ-
स्तदनु व्यङ्ग्यार्थः प्रतीयते इत्येव नियमः । ततश्च वाच्यस्य नाशस्य व्यङ्ग्येन शमादि-
भाव को मानने पर अरुण कान्ति के कारण के रूप में वह तो व्यंग्य ही है, तो यहाँ
ध्वनि हो जाता है ।
अब शान्त्यादि को प्रधान मानने वाले शंका करते हैं कि उपर्युक्त उदाहरण में
शब्द से वाच्य शान्ति का अन्वय तो अरुण कान्ति से ही है, अमर्ष से नहीं । तब तो
'अरुण कान्ति का प्रशम' यही वाच्यार्थ निर्णीत हुआ, न कि उस वाच्यार्थ से व्यंग्य
रोषप्रशम आदि, क्योंकि व्यंग्य (रोषप्रशम) और वाच्य (अरुणकान्तिप्रशम) में
भेद रखना तो आवश्यक ही है । इस स्थिति में शान्ति का प्रधान मानने पर भी यहाँ
भावशान्तिध्वनि ठीक ही रहता है । यदि इस पर कोई कहे कि केवल आरुण्य (लाली)
से व्यंग्य होते हुए रोष का वाच्यस्वरूप प्रशम के साथ ही अन्वय यहाँ है और तब तो
प्रशम वाच्य ही रहा, व्यंग्य नहीं, तो यह आपत्ति ठीक नहीं है; क्योंकि वाच्य और
व्यंग्य का बोध आनुपूर्वी (एक के बाद दूसरा) रूप में ही सिद्ध है, तो वाच्यार्थ के
अन्वयबोध के समय में वाच्य के साथ व्यंग्य अर्थ का अन्वय ही अनुपपन्न (अयुक्त) है,
क्योंकि उस समय व्यंग्य अर्थ उपस्थित ही नहीं है । यदि ऐसा न हो तो "मुदृशो
नयनाब्जकोणयोः'" इसका 'अरुणद्युति' के द्वारा व्यंग्य अमर्ष से अन्वय ही नहीं हो