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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 414 में से

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पृष्ठ 390

३५८ रसगङ्गाधरः
उदयस्य वाच्यत्वेऽपि भावस्यावाच्यत्वाद् ध्वनित्वं सुस्थितमिति चेत्
प्रधानस्य व्यपदेशानौपयिकत्वेऽप्रधानकृतव्यपदेशस्यानुपपत्तेः । अस्मन्मते तूत्पत्ते-
र्वाच्यत्वेऽपि उत्पत्त्यवच्छिन्नामर्षस्य प्रधानस्यावाच्यत्वाद् युक्त एव भावोदय-
ध्वनिव्यपदेशः । एवं व्यज्यमानभावप्रतियोगिकस्य प्रशमस्य वाच्यत्वे भाव-
शान्तिध्वनित्वं न स्यात् । यथा—
क्षमापणैकपदयोः पदयोः पतति प्रिये ।
शेमुः सरोजनयना-नयनारुणकान्तयः ॥
ननु भावोदये भावस्य उदयस्य च समवेतत्वेनैव ध्वनित्वमिति प्रस्तुतपक्षे
उदयस्य वाच्यत्वेऽपि भावस्य व्यंग्यत्वाद् ध्वनित्वमुचितमिति चेन्न, भवन्मते प्रधानस्य
उदयस्य व्यपदेशानौपयिकत्वे मुख्यव्यवहाराप्रयोजकत्वे (व्यंग्यार्थप्रतिपादकत्वाभावे )
सति अप्रधानस्य भावस्य कृतो यो व्यङ्ग्यार्थव्यवहारस्तस्य ग्रहणानुपपत्तेः । अस्मन्मते
भावप्रधानवादिमते उत्पत्तिविशिष्टस्य अमर्षभावस्य प्रधानस्य व्यंग्यत्वाद् भावोदयध्व-
नित्वं सम्भवत्येव ।
एवं यथा भावोदये भावस्याप्राधान्ये स्वीकृते उदयस्य यत्र वाच्यत्वं तत्र
भावोदयध्वनित्वं न सम्भवति, तथैव भावशान्तौ व्यज्यमानभावस्थले तदभावरूपस्य
प्रशमस्य शान्तेर्यदि वाच्यत्वं तर्हि तत्र ध्वनित्वं न स्यादित्यपि दोषः समापतति !
यथा—क्षमापणस्य अपराधमर्षणस्य एकमात्रस्थानस्वरूपयोः स्वपदयोः नायिकाचरणयोः
प्रिये पतति प्रणमति सति सरोजनयनायाः नायिकायाः नयनारुणकान्तयः नेत्रशोण-
यदि आप कहेंगे कि उदय के वाच्य रहने पर भी भाव के अवाच्य (व्यंग्य)
रहने से इसे ध्वनि कहना ठीक ही है, तो यह भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि प्रधान
(उदय) के मुख्य व्यवहार व्यंग्यार्थप्रतिपादकत्व मे असाधक होने पर अप्रधान (भाव)
के द्वारा कृत व्यंग्यार्थ-व्यवहार उचित नहीं है। हमारे (भावप्रधानवादी) के मत में
तो उत्पत्ति के वाच्य होने पर भी उत्पत्तिकालिक अमर्ष के प्रधानरूप में अवाच्य
(व्यंग्य) रहने से भावोदय ध्वनि कहना उचित ही है। इसी प्रकार व्यंग्य भाव के
विशेष्य प्रशम (शान्ति) के वाच्य रहने पर भावशान्तिध्वनि नहीं हो सकेगा।
जैसे—
क्षमा देने का एकमात्र स्थान प्रिया के चरणों पर प्रिय के गिरने पर
कमलनयना के आंखों की लाल कान्ति शान्त हो गयी ।
यह भावशान्तिध्वनि का उदाहरण है। यदि भाव को प्रधान न मान कर
शान्ति को ही प्रधान मानते हैं तो वह (शान्ति) 'शेमुः' इस पद का वाच्यार्थ ही है,
उसे ध्वनि कैसे कहा जा सकता है ? पर शान्ति का प्रतियोगी (विशेष्य) अमर्ष