रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 384, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंanusvara).
"होती हुईं" - yes.
"वीरता" - yes.
Line 31:
लुभायी हुईं कभी संकुचित एवं कभी विकसित होती हैं ।
Line 32:
यहाँ भगवान् राम में स्थित अलौकिक यौवन की उत्पत्ति का और उसी तरह
Line 33:
के ( अलौकिक ) शील, शौर्य आदि का दर्शन विभाव है । आँखों का संकुचित एवं
Wait, is there a space after है: "विभाव है ।" or "विभाव है।"?
In line 33: "विभाव है ।"
Line 34:
विकसित होना अनुभाव है । लज्जा और औत्सुक्य भावों की सन्धि व्यङ्ग्य है । इसी तरह—
Wait, look at the end of line 34:
"अनुभाव है । लज्जा और औत्सुक्य भावों की सन्धि व्यङ्ग्य है । इसी तरह—"
Wait, is there a space before the danda?
"अनुभाव है। लज्जा और औत्सुक्य भावों की सन्धि व्यङ्ग्य है। इसी तरह—"
Let's double-check all punctuation and line breaks. Everything matches the layout of the page perfectly.३५२ रसगङ्गाधरः
एवम्—
भावसन्धिरन्योन्यानभिभूतयोरन्योन्याभिभावनयोग्ययोः सामाना-
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