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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

प्रथमाननम् ३५१
भावोदयो भावस्योत्पत्तिः ।
उदाहरणम्—
वीक्ष्य वक्षसि विपक्षकामिनी-हारलक्ष्म दयितस्य भामिनी ।
अंसदेश-वलयीकृतां क्षणादाचकर्ष निजबाहु-वल्लरीम् ॥
अत्रापि दयितवक्षोगत-विपक्षकामिनी-हारलक्ष्मदर्शनं विभावः । प्रियां-
सदेश-वलयीकृत-निजबाहु-लताकर्षणमनुभावः । रोषादयो व्यङ्ग्यः ।
यद्यपि भावशान्तौ भावान्तरोदयस्य, भावोदये वा पूर्वं भावशान्तेरा-
वश्यकत्वाद् नानयोर्विविक्तो व्यवहारस्य विषयः, तथापि द्वयोरेकत्र चमत्कार-
विरहात्, चमत्काराधीनत्वाच्च व्यवहारस्य, अस्ति विषयविभागः ।
नायिकागतः प्रसाद एव अमर्षनाशसूचक इति तस्यैवानुभावत्वमित्यभिप्रायेण पक्षान्तर-
मुक्तम् । उत्पत्तिकालावच्छिन्नः सद्योजायमानः ।
भावोदयं निरूपयति—भावोदय इति । वर्णनप्रसङ्गेऽविद्यमानस्य कस्यचिद्
भावस्य उत्पत्तिर्जन्म भावोदयशब्देनोच्यते ।
वीक्ष्येति । हर्षेण प्रियालिङ्गिता भामिनी अकस्मात् प्रियस्य वक्षसि विपक्ष-
कामिन्याः प्रतिनायिकाया अचिरोपभोगकालिक-हारचिह्नं वीक्ष्य अंसदेशवलयीकृतां
प्रियस्कन्धोपरि वेष्टितां निजबाहुलतां क्षणादेव आचकर्ष पृथक्कृतवती । अत्र हर्षभाव-
नाशोत्तरममर्षभावस्योत्पत्तिः प्रधानतया वर्णितत्वेन ध्वनिः ।
अत्रापीति । पूर्ववर्णितभावशान्त्युदाहरणे अमर्षभाव एव आश्रितः, अत्रापि
भावोदये स एव वर्णितः । पूर्ववदत्रापि रोषपदममर्षस्य बोधकम् ।
भावान्तरोदयस्येति । पूर्वोक्तभावशान्त्युदाहरणे अमर्षनाशे हर्षोदयस्य,
उपनायिका के हारचिह्न को देखकर क्षणभर में उसके (प्रिय के) कन्धे से लिपटी
बाँहरूपी लता को हटा ली ।
यहाँ हर्षभाव के नाश के बाद अमर्ष भाव की उत्पत्ति ही प्रधानतया वर्णित है ।
अतः यह भावोदय ध्वनि का उदाहरण है ।
भावशान्ति की तरह यहाँ भी अमर्ष भाव ही आश्रित है । प्रिय के छाती पर
स्थित विरोधिनी नायिका (सपत्नी) के हारचिह्न का दर्शन विभाव है । प्रिय के
कन्धे पर लिपटी अपनी बाहुलता को खींचकर हटा लेना अनुभाव है । 'सपत्नी से यह
मेरा प्रिय प्रेम करता है' इस अपराध से रोष, 'सपत्नी ने इसे मोह लिया है' इस ज्ञान
से ईर्ष्या आदि व्यंग्य होते हैं ।
यद्यपि जहाँ भावशान्ति वर्णित होगी वहाँ किसी भाव का उदय भी अवश्य
होगा और जहाँ भावोदय होगा वहाँ किसी भाव की शान्ति अवश्य होगी—यह निश्चित
है और ऐसी स्थिति में इन दोनों भावशान्ति एवं भावोदय का एक-दूसरे से अलग रूप