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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 414 में से

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पृष्ठ 382

३५० रसगङ्गाधरः
अथ भावशान्तिः
भावस्य प्रागुक्तस्वरूपस्य शान्तिर्नाशः ।
स चोत्पत्यवच्छिन्न एव ग्राह्यः, तस्यैव सहृदयचमत्कारित्वात् ।
उदाहरणम्—
मुञ्चसि नाद्यापि रुषं, भामिनि ! मुदिरालिरुदियाय ।
इति तन्व्याः पतिवचनैरपायि नयनाब्जकोणशोणरुचिः ॥
इह तादृश-प्रियवचनश्रवणं विभावः, नयनकोणगतशोणरुचेर्नाशः,
तदभिव्यक्तः प्रसादो वाऽनुभावः । उत्पत्तिकालावच्छिन्नो रोषनाशो व्यङ्ग्यः ।
तथा—
भावस्येति । सञ्चारिभावस्य हर्षाद्यन्यतमस्य नाशो भावशान्तिः । स च नाशश्च
उत्पत्तिकालिको भावलोपाव्यवहितकालिक एव सहृदयचमत्कारकत्वाद् भावशान्तिः
कथ्यते, न तु नाशोत्तरदीर्घकालिकः । उदाहरति—मुञ्चसीति । हे भामिनि कोपने !
मुदिरालिर्मेघमाला उदियाय प्रादुर्भूता, त्वञ्च अद्यापि इदानीमपि रुषं कोपं न मुञ्चसि,
मेघमालादर्शनेन तव कोपस्य स्थितिरसम्भवेति । इति एवंविधैः पतिवचनैः तन्व्याः
कोमलाङ्ग्याः नयनकमलकोणगतरक्तताच्छविः अपायि पीता विनाशितेति यावत् ।
शोणरुचिद्वाराऽमर्षभावः पूर्वस्थितो व्यज्यते, पतिवचनेन च तन्नाशस्य सद्योजातत्वेनात्रा-
मर्षभावशान्तिः ।
तादृशं मेघमालागमनबोधकं रतेः परमोद्दीपकम् । शोणरुचिनाशाद् अभिव्यक्तो
अब भावशान्ति का निरूपण करते हैं । पूर्वोक्त हर्षादि भावों के शान्तिकालिक
स्वरूप को भावशान्ति कहते हैं ।
लक्षण में 'नाश' पद से उत्पत्तिकालिक नाश का ही ग्रहण करना चाहिए,
क्योंकि सहृदयों को वही चमत्कृत करता है । उदाहरण—
'हे कोपने ! मेघमाला उदित हो गयी, पर अभी भी कोप को नहीं छोड़ रही
हो' पति के इन वचनों ने कोमलाङ्गी के नयनकमल के कोने में स्थित लाल छवि को
पी लिया ।
मेघमालादर्शन से मानिनी का मान टिक नहीं सकता है । यहाँ इस प्रकार के
प्रियतम-कथित वचन का सुनना विभाव है और नयनकमल के कोने में स्थित लाल
छवि का नाश या उस लाल छवि के नाश से प्रकटित प्रसन्नता अनुभाव है ।
इसी तरह वर्णन के समय में ही भाव की उत्पत्ति को भावोदय कहते हैं ।
उदाहरण—
हर्ष से प्रिय को आलिङ्गित करती हुई नायिका ने अचानक प्रिय के छाती पर