रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्र च स्वात्मत्यागात्यागाभ्यां स्रक्चन्दनादिषु विषयेषु चिरसेवितायां
विद्यायां च कृतघ्नत्वम्, अस्यां च लोकोत्तरत्वमभिव्यज्यमानं व्यतिरेकवपुः
स्मृतिमेव पुष्णातीति सैव प्रधानम् । एवं च त्यागाभावगतं सार्वदिकत्वं व्यञ्ज-
यन्त्यधिदेवतोपमापि । एषा चानुचितविषयकत्वादनुभयनिष्ठत्वाच्च भावा-
भासः । यदि पुनरियं तत्परिणेतुरेवोक्तिः, तदा भावध्वनिरेव ।
अत्र व्यङ्ग्योऽपि व्यतिरेकालङ्कारः स्मृतेरङ्गमवे । तथाहि—आजन्मसेविताः
स्रक्चन्दनादयो विषयाः चिरसेविता विद्या च स्वस्मिन् आत्मीये चिरसेवके नायके
आत्मनः स्वत्वस्य ( विषयत्व-विद्यात्वयोः ) त्यागेन कृतघ्नतां कृतज्ञत्वाभावं प्रकाशयतः,
किन्तु इयं हरिणशावकलोचना स्वस्मिन् आत्मीयेऽचिरसेवके नायके आत्मनः स्वत्वस्य
( प्रियात्वस्य ) अत्यागेन कृतज्ञतामेव व्यनक्तीति त्रयाणां विषय-विद्या-नायिकानां सेव्य-
त्वेन साम्येऽपि त्यागात्यागाभ्यां वैषम्यदर्शनाद् व्यतिरेकः स्मृतिपोषकत्वेनाऽङ्गम् । यथा
पृथिव्याद्यधिष्ठातृदेवता स्वसेवकं न कदापि त्यजति तथैवेयं नायिकापि इत्युपमापि
स्मृतेरेव पोषिका ।
अनुचितविषयकत्वात् अतिप्रतिषिद्धनायिकाचिन्तनविषयत्वात्, अनुभयनिष्ठ-
त्वादेकतरनिष्ठत्वादिति । यदि तया नायिकया परिणयानन्तरं विदेशस्थस्य नायकस्योक्ति-
रियं तदा स्मृतिभावध्वनिरेव न भावाभासः, अनुचितत्वाभावात् ।
किसी अन्य विदेशस्थ नायक की यह उक्ति है, जो रति के लिए अत्यन्त निषिद्ध
नायिका का स्मरण कर रहा है ।
यहाँ आजन्म सेवित माला, चन्दन आदि विषयों एवं चिरकाल से सेवित विद्या
में स्वसेवक ( नायक ) के प्रति आत्मत्याग ( विषयत्व एवं विद्यात्व को छोड़ने ) के
कारण उससे कृतघ्नता एवं इस ( नायिका ) में स्वसेवक ( नायक ) के प्रति आत्म-
त्याग ( नायिकात्व रूप से न छोड़ने ) के कारण उससे अलौकिक ( अद्भुत ) कृतज्ञता
अभिव्यक्त होती हुई व्यतिरेकस्वरूप से स्मृतिभाव को ही पुष्ट कर रही है । नायक के
द्वारा सेवित विषय, विद्या और नायिका में सेवितत्व रूप से सादृश्य रहने पर भी
चिरसेवित विषय और विद्या द्वारा नायक का त्याग और अचिरसेवित नायिका द्वारा
अत्याग रूप ही व्यतिरेक है । इसी तरह त्याग न करने में 'सदा' इस गुण को व्यक्त
करती हुई पृथिव्यादि अधिदेवता की उपमा भी स्मृति को ही पुष्ट कर रही है । यहाँ
व्यंग्य अलंकार गौण एवं स्मृतिभावाभासध्वनि प्रधान है । यह स्मृति अनुचित
( परस्त्री ) विषयक होने से एवं अनुभयनिष्ठ ( केवल नायकनिष्ठ ) रहने से भावाभास
है और यदि यह उक्ति वर्णित नायिका के पति की ही हो, तो भावध्वनि ही है ।