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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 414 में से

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पृष्ठ 380

एवमेवानुचितविषया भावाभासाः ।
यथा—
सर्वेऽपि विस्मृतिपथं विषयाः प्रयाता
विद्यापि खेदकलिता विमुखीबभूव ।
सा केवलं हरिणशावकलोचना मे
नैवापयाति हृदयादधिदेवतेव ॥
गुरुकुले विद्याभ्याससमये तदीयकन्यालावण्यगृहीतमानसस्य, अन्यस्य
वा कस्यचिदतिप्रतिषिद्धगमनां स्मरतो देशान्तरं गतस्येयमुक्तिः ।
इन्द्रजालाख्याद्भुतविद्याप्रदर्शकः । यज्ञीयपशुघातस्य लोके सहृदयैर्नानौचित्यं ज्ञायते ।
यैर्बौद्धादिभिस्तत्रानौचित्यप्रतीतिः क्रियते, तेषां तत्र रसाभास एव ।
एवमेवेति । रसाभासवदेव आलम्बनविभावगता अनुचिता विषया येषां ते
भावा एव भावाभासा भवन्ति । तथा च भावविशेषा एव भावाभासाः । स्थायिभावा-
श्रितास्तु रसाभासाः ।
उदाहरति—सर्व इति । अधुना प्रियायाः स्मरणावसरे सर्वेऽपि विषया दर्शन-
श्रवणादिविषयाः चिरसेविता अपि विस्मृतिपथं गताः, चिरादभ्यस्ता विद्याऽपि पराङ्गना-
प्रीतिदर्शनेनेर्ष्यावशात् खेदकलिता खिन्ना सती मद्दिङ्मुखीभूता । परन्तु केवलमेका
साऽचिरपूर्वं सेविता हरिण-शिशुलोचना प्रिया मे मम हृदयाद् अधिदेवता पृथिव्याद्य-
धिष्ठातृदेवतेव नैव अपयाति कदापि नैव दूरीभवति ।
तदीयेति । गुरुकुलसम्बन्धिनीत्यर्थः । 'अप्रतिषिद्धे'ति मूलपाठो हि मूलोच्छेद-
करत्वादुपेक्षितः, तथा सति अ-नौचित्याभावाद् भावाभासत्तैवात्र न स्यात् ।
होने पर घृणा ही बीभत्स रसाभास होता है। ग्रन्थविस्तार के भय से इन सभी रसा-
भासों का उदाहरण नहीं दिया गया है, इन उदाहरणों का ऊह स्वयं विद्वान् लोग
कर लेंगे।
इसी प्रकार रसाभास की तरह ही अनुचित विषय रहने पर भावाभास होते
हैं। अर्थात् जिस भाव का आलम्बनविभाव अनुचित हो उसे भावाभास कहते हैं।
सहृदयों को जो अनुचित मालूम पड़े उसे ही यहाँ अनुचित कह सकते हैं। उदाहरण—
विरही नायक कहता है कि अभी (इस विरह-व्यथा में) सभी विषय (दर्शन-
श्रवणादि से उत्पन्न) विस्मृति के मार्ग पर गयी हुई विद्या भी (परस्त्री-विषयक प्रीति
देख) खिन्न होकर विमुख हो गयी, केवल मेरी वह (पूर्वदृष्टा अनुरक्ता) बालहरिण-
लोचना (प्रिया) अधिष्ठात्री देवी के समान मेरे हृदय से कभी नहीं जाती है।
गुरुकुल में विद्याभ्यास के समय गुरुपुत्री के सौन्दर्य से आकृष्ट मन वाले या