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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

प्रथमाननम् ३४७
एवं कलहशील-कुपुत्राद्यालम्बनतया वीतरागादिनिष्ठतया च वर्ण्यमानः
शोकः, ब्रह्मविद्यानधिकारिचण्डालादिगतत्वेन च निर्वेदः, कदर्य-कातरादि-
गतत्वेन पित्राद्यालम्बनत्वेन वा क्रोधोत्साहौ, ऐन्द्रजालिकाद्यालम्बनत्वेन च
विस्मयः, गुर्वाद्यालम्बनतया च हासः, महावीरगतत्वेन भयम्, यज्ञीयपशु-
वसाऽसृङ्मांसाद्यालम्बनतया वर्ण्यमाना जुगुप्सा च रसाभासाः । विस्तृतिभया-
च्चामी नोदाहृताः सुधीभिरुन्नेयाः ।
क्षेपेणापि विषयं प्रत्यक्षीकर्त्तुं न प्रभवतीत्यर्थः । दीर्घं श्वासमङ्गीकरोति, अङ्गेषु च
मनागपि ईषदपि धृतिं न धत्ते । अत्र प्रलापेन उन्मादः, मौनालम्बनेन श्रमः, दृष्टि-
दानेऽप्यदर्शनात् मोहः, दीर्घश्वासाच्चिन्ता, धैर्याभावाच्च व्याधिर्भावोऽभिव्यज्यते,
तैश्च विप्रलम्भाभासो व्यज्यते, प्राधान्येन च तस्यैव ध्वनिपदव्यवहार्यता ।
एवमिति । अनुचितालम्बनादिगता रतिर्यथा रसाभासो भवति, तथैव अनुचि-
तालम्बननिष्ठा अनुचिताश्रयनिष्ठाश्च शोकादयः सर्वेऽपि स्थायिभावा रसाभासतां यान्ति ।
पित्रा कलहं कृत्वा कुपुत्रो हि पितुः शोकस्य कारणतया आलम्बनविभावो भवति, एवं-
विधानुचित-कलहोत्पन्नः शोको, वीतरागो विरक्तः तन्निष्ठस्तदाश्रितोऽपि शोको हि
करुणरसाभासः । शोक-मोहादिशमनेनैव वीतरागत्वं भवति, तस्मिन् शोको नोचितः ।
नित्यानित्यवस्तुविवेकजन्यस्य निर्वेदस्य ब्रह्मविद्याज्ञानादेव प्रादुर्भावः सम्भवति, चाण्डा-
लादेः स्वभाव एव तथाविधविवेकवैमुख्यस्य । अत एवानधिकारित्वमुक्तम् । कदर्यः कृपणः,
कातरो भीरुः, आदिपदेन दुर्बलखञ्जादिपरिग्रहः, तदाश्रितयोः, गुरुपित्राद्यालम्बयोः
शिष्यपुत्राद्याश्रितयोः क्रोधोत्साहयोरनौचित्येन रौद्र-वीररसाभासता । ऐन्द्रजालिक
प्रधान रूप से परिपुष्ट होने के कारण ध्वनि कहलाने योग्य है । तात्पर्य यह है कि यहाँ
उन्मादादि भावाभास रत्याभास के उपकारक होने से गौण हैं, उन्हें ध्वनि की पदवी
नहीं मिल सकती है, जबकि रत्याभास उनके द्वारा पुष्ट होने के कारण ध्वनि ही है ।
इसी प्रकार शृंगाराभास की तरह करुणादि रसों के भी आलम्बनगत अनौचित्य
से करुणाभासादि होते हैं । यथा— पिता से कलह करने वाले कुपुत्र के आलम्बन से
पितृगत शोक एवं विरक्त में रहने वाला शोक वर्णित होने पर करुणाभास हो जाता है ।
ब्रह्मविद्या के अनधिकारी चाण्डाल आदि (घोर कुकृत्यों में लिप्तों) में स्थित निर्वेद
वर्णित होने पर शान्तरसाभास हो जाता है । कृपण एवं कायर आदि में स्थित अथवा
पिता आदि गुरुजनों पर होने वाला पुत्रादि स्थित क्रोध और उत्साह वर्णित होने पर
क्रमशः रौद्र एवं वीर रस के आभास होते हैं । जादूगर आदि के आलम्बन से उत्पन्न
विस्मय अद्भुतरसाभास होता है । गुरु आदि के आलम्बन से शिष्यादिगत हास
हास्यरसाभास होता है । महान् वीर में स्थित भय वर्णित होने पर भयानक रसाभास
होता है । यज्ञ में घातित पशु के चर्बी, शोणित, मांस आदि के आलम्बनरूप में वर्णित