रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 378, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ रसगङ्गाधरः
तत्र शृङ्गाररस इव शृङ्गाररसाभासोऽपि द्विविधः, संयोग-विप्रलम्भ-
भेदात् । संयोगाभासस्त्वनुपदमेवोदाहृतः । विप्रलम्भाभासो यथा—
व्यत्यस्तं लपति क्षणं, क्षणमथो मौनं समालम्बते,
सर्वस्मिन् विदधाति किं च विषये दृष्टिं निरालम्बनाम् ।
श्वासं दीर्घमुरीकरोति, न मनागङ्गेषु धत्ते धृतिं,
वैदेही-कमनीयता-कवलितो, हा हन्त ! लङ्केश्वरः ॥
अत्र सीतालम्बनेयं लङ्केशगता विप्रलम्भरतिरनुभयनिष्ठतया, जगद्-
गुरुपत्नीविषयकतया चाभासतां गता 'व्यत्यस्तं लपती'त्यादिभिरुक्तिभि-
र्व्यज्यमानैरुन्माद-श्रम-मोह-चिन्ता-व्याधिभिस्तथैवाभासतां गतैः प्राधान्येन परि-
पोष्यमाणा ध्वनिव्यपदेशहेतुः ।
सम्भवान्नात्र रसाभास इति । यत्तु रसचन्द्रिकाकृद् ‘न च तस्याम् ( अनुभयनिष्ठायां )
रतेरयुक्तताधीर्लोकस्य" इति तन्नास्मभ्यं रोचते, एकपक्षीयर्तिस्थले विवाहितायाम-
विवाहितायां वा अनौचित्यस्य सर्वानुभवसिद्धत्वात्, अनौचित्याभावे हि रसाभासलक्षणमेव
तत्राव्याप्तं स्यात् ।
अनुपदमेवेति । सद्यः प्रदर्शितपूर्वोदाहरणत्रये । व्यत्यस्तमिति । हा हन्त !
वैदेह्या जानक्याः कमनीयतया सौन्दर्येण कवलितो ग्रस्तोऽत्यन्तमाकृष्टो लङ्केश्वरो रावणः
क्षणं व्यत्यस्तमसम्बद्धं लपति प्रलापं करोति, अथोऽनन्तरं क्षणं मौनं समालम्बते, किञ्च
अपि च सर्वस्मिन् विषये निरालम्बनां शून्यां निष्फलां दृष्टिं विदधाति निक्षिपति दृष्टि-
अभिव्यक्त होने के कारण यह रसाभास ही है—ऐसा नवीन आचार्य कहते हैं । परन्तु
प्राचीन आचार्य तो अविवाहित अनेक नायक विषय की रति को ही आभास मानते हैं ।
यहाँ तो पाँचों पाण्डव द्रौपदी से परिणय करने वाले हैं, अतः यहाँ रस ही है ।
शृंगार रस जैसे दो प्रकार का होता है, वैसे ही शृंगाररसाभास भी संयोग
और विप्रलम्भ भेद से दो प्रकार का है । उनमें संयोगाभास का तो अभी-अभी उदाहरण
दिया जा चुका है । अब विप्रलम्भाभास का उदाहरण दिया जा रहा है—
हाय हाय ! सीता के सौन्दर्य से वशीभूत लंकाधिपति रावण अत्यन्त व्याकुल
है—क्षण में उलटा-पुलटा ( असम्बद्ध ) बोलता है, क्षण में ही चुप हो जाता है ( चुप्पी
लगा लेता ), सभी विषयों में शून्य दृष्टि लगाता है ( देखते हुए भी न देख पाता है ),
दीर्घ श्वास लेता है और अंगों में स्थिरता नहीं रखता है ।
यहाँ सीता पर आश्रित रावण में स्थित विप्रलम्भ रति अनुभयनिष्ठ होने के
कारण एवं जगद्गुरु श्रीरामचन्द्र की पत्नी के विषय में रहने के कारण आभास
( रत्याभास ) होकर 'व्यत्यस्तं लपति' इत्यादि उक्तियों के द्वारा अभिव्यक्त ( व्यंग्यार्थ )
होते हुए उन्माद, श्रम, मोह, चिन्ता और व्याधि, जो आभास हो रहे हैं, के द्वारा