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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 414 में से

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पृष्ठ 376

३४४ रसगङ्गाधरः
यथा वा—
भुजपञ्जरे गृहीता, नवपरिणीता वरेण वधूः।
तत्कालजालपतिता, बालकुरङ्गीव वेपते नितराम्॥
अत्र रतेर्नववध्वा मनागप्यस्पर्शादनुभयनिष्ठत्वेनाभासत्वम्। तथा
चोक्तम्—
“उपनायक-संस्थायां, मुनि-गुरुपत्नीगतायां च।
बहुनायक-विषयायां, रतौ तथानुभयनिष्ठायाम्” ॥ इति।
युवत्युक्तिश्रवणमेव साधकमित्येव तरुणेषु लालसा। सुदूरं यावदनुगमनरूपपरिश्रमेण
तरुणानां युवती दयावती सती दृष्टिं प्रक्षिप्य, न तु वचनेनाज्ञां दत्तवती। बहुवचनेनेति।
तेनात्र यदि एकवचनं प्रयुज्यते तर्हि रसप्रतीतिरेव।
रसाभासस्य तृतीयं प्रभेदमनुभयनिष्ठरतिमुदाहरति—यथा वेति। नवविवाहिता.
बाला वरेण ( नायकेन ) बाहुपाशे गृहीता सती तत्क्षण-जाल-निबद्धा बालमृगी इव
नितरां कम्पते। कम्पनेनात्र बालायां त्रास एवाभिव्यज्यते, न रतिः, मुग्धत्वातिशयाद-
ननुभूतरतित्वाच्च।
अनुचितत्वं हि रतौ कुत्र कुत्र भवतीति परिगणनं भेदप्रदर्शनपूर्वकं प्राचीनोक्तं
प्रस्तौति—उपनायकेति। उपपतिविषयिणी, मुनि-गुरु-राजपत्नीविषयिणी, बहुनायक-
विषयिणी, अनुभयविषयिणी ( एकपक्षाश्रिता ) च रतिः चतुर्विधा रसाभासतां याति।
अत्र मुनिपत्न्यादिविषयिणी रतिर्हि उपपतिविषयिणी एव, किन्तूपपतिविषयिणी
साधारणानौचित्यं, मुनिपत्न्यादिविषयिणी तु अत्यन्तानौचित्यं जनयतीत्यनयोर्भेदः।
ग्रन्थकृता तूभयोरेकत्वमेवोररीकृतम्।

गयी। इस गमनाज्ञा देने के सूचक नयनकमलप्रक्षेपरूप अनुभाव के वर्णन से अभिव्यक्त
होती हुई रति बहुवचन के द्वारा बहुविषयक सूचित होती है। इसलिए यह भी
रसाभास ही है।
रसाभास के तृतीय भेद अनुभयनिष्ठा रति ( एकपक्षीय ) का उदाहरण प्रस्तुत
किया जा रहा है—पति ने नवीन विवाहिता वधू को बाहुपाश में बाँध लिया। इससे
वह वधू तत्क्षण जाल में फँसी बालमृगी के समान अतिशय काँपने लगी'। कम्पन से
यहाँ बाला में त्रास ही व्यक्त होती है, रति नहीं, क्योंकि वह अतिशय मुग्धा है और
रति का अनुभव अभी उसे हुआ ही नहीं है।
यहाँ रति का नववधू से थोड़ा भी स्पर्श न होने के कारण अनुभयनिष्ठ ( दोनों
में न रहकर एक में ही स्थित ) द्वारा आभासता है। जैसा कि कहा गया है—
उपपति में रहने वाली, मुनिपत्नी, गुरुपत्नी आदि में रहने वाली, बहुतों नायकों
में एक नायिका द्वारा रहने वाली और अनुभयनिष्ठा रति आभासता को प्राप्त करती है।