रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३४३
भवनं करुणावती विशन्ती गमनाज्ञालव-लाभलालसेषु ।
तरुणेषु विलोचनाब्जमालामथ बाला पथि पातयाम्बभूव ॥
अत्र कुतश्चिदागच्छन्त्याः पथि तदीयरूपयौवनगृहीतमानसैर्यू/र्युवभिरनु-
गम्यमानायाः कस्याश्चिद् भवनप्रवेशसमये निजसेवासार्थक्यविज्ञानाय गमनाज्ञा-
पन्यरूपलाभलालसेषु तेषु परमपरिश्रमश्रवणसञ्जातकरुणाया गमनाज्ञादान-
निवेदकस्य विलोचनाम्बुजमालापरिक्षेपस्यानुभावस्य वर्णनादभिव्यज्यमाना
रतिर्बहुवचनेन बहुविषया गम्यत इति भवत्ययमपि रसाभासः ।
बहुनायकविषयरतिस्वरूपं द्वितीयं रसाभासमुदाहरति-यथा वेति । काचिद्
बाला ग्रामान्तरात् स्वगृहमागच्छन्ती सती (स्वगृहसमीपमागत्य) स्वभवनं प्रविशन्ती
(प्रवेशकाले) पथि 'चिरानुगमनानन्तरं गमनस्य परावर्त्तनस्य आज्ञाया यो लवो लेशस्तस्य
लाभाय लालसा येषां' तेषु अनुरक्तेषु तरुणेषु करुणावती दयावती सती अथ अन्ततो
विलोचनाब्जमालां नयनकमलश्रेणिं कतिपयकटाक्षान् पातयामास निक्षिप्तवती । अत्र
बालाया अनुगमनेन तरुणेषु दृष्टिपातेन च बालायां रतिरभिव्यज्यते ।
निजसेवेति । प्रीत्यानुगमनरूपा तरुणदलकृता युवत्याः सेवा तस्या हृदये
मनागपि स्थानं लब्धवती न वेति ज्ञानाय 'भवन्तः स्वगृहं प्रति प्रस्थातुमर्हन्ति' इति
ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण वाक्यार्थ ही है ।) अन्य (नायिकानिष्ठ रति) तो वाक्य के
एकदेशीयार्थ पर ही आश्रित हैं ।
बहुनायकविषयक रतिवाले रसाभास का उदाहरण—कोई तरुणी दूसरे गाँव से
अपने घर जा रही थी, रास्ते में एक तरुणदल उसके पीछे मोहित होकर चल रहे थे,
जब वह बाला अपने घर प्रवेश करने लगी तो वे युवकगण रुक गये कि अब हमें यह
तरुणी प्रस्थान करने की आज्ञा दे तो हम उसी से कृतार्थ हो जायेंगे । दयावती उस
तरुणी ने राह पर खड़े उन युवकों पर नयनकमल की श्रेणी ही डाल दी । इसी से वे
अपने को धन्य समझ कर चले गये ।
यहाँ कहीं से आती हुई एक युवती का, राह में उसके रूप और यौवन से
आकृष्ट मनवाले युवकों ने पीछे-पीछे चलना शुरू कर दिया । जब वह अपने घर के
पास पहुँचकर घर में प्रवेश करने लगी तो वे वहाँ रुक गये । देर तक साथ रहने पर
भी उस तरुणी का न तो वचन सुना और न ही नजर ही मिला सके । आखिर सुदूर तक
अनुगमनरूप अपनी सेवा की सार्थकता (इस सेवा का स्थान उस तरुणी के हृदय में
कुछ है या नहीं) को जानने के लिए 'अब आपलोग जा सकते हैं' इस आज्ञा को पाने
के हेतु वे युवक तरस रहे थे । वह तरुणी भी उनके अथक परिश्रम को जानकर दया से
उन पर अपने नयनकमल से एक नजर डाल दी, जिससे उन्हें जाने की आज्ञा मिल