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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 414 में से

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पृष्ठ 374

३४२ रसगङ्गाधरः
न चात्र चकितनयनाभित्यनेन परपुरुषस्पर्शत्रासाभिव्यक्त्या रतेरनु-
भयनिष्ठतेत्याभासताहेतुर्वाच्यः । अस्याश्च चिराय तस्मिन्नासक्ताया अन्तः-
पुरे परपुरुषागमनस्यात्यन्तमसम्भावनया 'क एष मां बोधयति' इत्युचित एव
त्रासः । अनन्तरं च परिचयाभिव्यक्त्या 'सोऽयं मत्प्रियो मदर्थं प्राणानपि तृणी-
कृत्यागत' इति ज्ञानादुत्पन्नं हर्षमभिव्यञ्जयत् 'स्मेरवदनाम्' इति विशेषणं रतिं
तदीयामपि व्यनक्ति, परन्तु प्राधान्यं नायकनिष्ठाया एव रतेः, सकलवाक्यार्थ-
त्वात् । यथा वा—
न चात्रेति । सुप्तावस्थायाः सद्योजागरणानन्तरमपि नायिकायां रतेरभावाननु-
भयनिष्ठतयैवोदाहरणमिदमिति पूर्वपक्षाभिप्रायः । जागृताया त्रासस्यैव दर्शनं तन्मतं
पुष्णाति । किन्तु 'स्मेरवदनाम्' इति विशेषणं तस्या हर्षं व्यञ्जयद् रतिमपि व्यञ्जयति ।
ततश्च नायिका अपि रतिविशिष्टैवेति नेदमुदाहरणमनुभयनिष्ठरत्याश्रितस्येत्युत्तरपक्षा-
भिप्रायः ।
तदीयामपीति । "हर्षसमुच्चायकोऽपिः" इति भट्टनागेशो वाक्यान्वयं सम्यक्
परीक्ष्यैव लिखति । सरलकृत्तु अत्रत्येनापिना नायकरतिं समुच्चाययति—तदेतद्वाक्या-
न्वयपरीक्षानिरपेक्षमेव । नहि "स्मेरवदनाम्" इति विशेषणं नायिकारतिमिव नायक-
रतिमभिव्यनक्ति येन नायकरतेरत्र समुच्चयः स्यात् । किञ्च नायकरतिः पूर्वसिद्धैव ।
अत्र केवलं नायिकारतिरेव साध्या, तयैव उभयनिष्ठा रतेरभिप्रेता सिद्धा भवति ।
वस्तुतः सन्दर्भान्वयो हि नायकरतिसमुच्चायकत्वमत्र 'अपि'शब्दस्य बोधयति ।
अत एव रतिमपीत्यनुक्त्वा तदीयामपीति लिखनं सङ्गच्छते । अपिर्हि यत्पदाव्यवहिताग्रे
प्रयुज्यते तत्रैवान्वेतीति नियमात् नायिकारतिप्रतियोगिनीं नायकरतिं समुच्चाययति ।
यदि कहें कि अनुभयनिष्ठ रति वाले रसाभास का ही उदाहरण है, क्योंकि
'चकितनयनां' इस पद से परपुरुषस्पर्श की शंका से त्रास की ही अभिव्यक्ति होती है,
रति की नहीं और तब तो नायिका में रति न रहने से यह एकपक्षीय ही हुई—तो
ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि यह नायिका तो बहुत दिन से इस नायक पर आसक्त ही है,
पर रनिवास में परपुरुष के आगमन का अत्यन्त असम्भव होने के कारण ( उस नायक
के आगमन की संभावना के अभाव में ) 'कौन यह मुझे जगा रहा है' इसमें त्रास
( भय ) उचित ही है । इसके बाद तुरत परिचय के व्यक्त हो जाने पर 'वही यह मेरा
प्रिय मेरे लिए प्राणों को भी तिनके के समान मान कर आया है' इस ज्ञान से उत्पन्न
हर्ष को प्रकाशित करते हुए "स्मेरवदनाम्" यह विशेषण उस ( नायिका ) की रति
को भी व्यक्त कर रहा है । ( उक्त विशेषण से नायिकानिष्ठ हर्ष एवं रति दोनों व्यक्त
होते हैं और तब रति का नायिकानिष्ठ हो जाने पर उभयनिष्ठता सिद्ध हो जाती है,
क्योंकि रति नायकनिष्ठ तो पूर्व से हो है । परन्तु प्रधानता तो नायकनिष्ठ रति की