रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३४१
उदाहरणम्—
शतेनोपायानां कथमपि गतः सौधशिखरं
सुधाफेनस्वच्छे रहसि शयितां पुष्पशयने ।
विबोध्य क्षामाङ्गीं चकितनयनां स्मेरवदनां
सनिश्वासं श्लिष्यत्यहह !! सुकृती राजरमणीम् ॥
अत्रालम्बनम् अनुचितप्रणया राजरमणी । रहोरजन्यादि उद्दीपनम् ।
साहसेन राजान्तःपुरे गमनं, प्राणेषूपेक्षा, निःश्वासाश्लेषादयश्चानुभावाः । शङ्का-
दयश्च सञ्चारिणः । निषिद्धालम्बनकत्वाच्चास्या रतेराभासत्वं रसस्य ।
शतेनेति । प्रच्छन्नकामुकस्य राजरमणीरमणवृत्तवर्णनमिदम् । कश्चित् सुकृती
पुण्यवान् कामुक उपायानां परमोच्चप्रासादारोहणानुकूलव्यापाराणां शतेन कथमपि
क्लेशेन सौधशिखरं राजप्रासादस्योच्चतमप्रकोष्ठं गतः प्राप्तः, तत्र सुधाफेनवन्निर्मलेऽति-
धवले पुष्पशय्यायां रहसि एकान्ते शयितां सुप्तां क्षामाङ्गीं विरहातिशयात् कृशाङ्गीं
राजरमणीं विबोध्य जागरयित्वा, तां चकितनयनां दुष्करतदागमनविस्मितमनां
स्मितमुखीम् अहह ! निःश्वासेन सहितं यथा स्यात्तथा श्लिष्यत्यालिङ्गति ।
अनुचितेति । अनुचितः साधारणपरपुरुषाश्रितः प्रणयो यस्याः । रहो-रजन्यादि
एकान्त-रात्रिप्रभृति । निषिद्धं सहृदयैरनुचितत्वेन ज्ञातमालम्बनं प्रच्छन्नकामुकसहिता
राजरमणी, तदाश्रितमिदमुदाहरणं रसाभासस्य प्रथमभेदस्यैव ।
रतिविषयक रसाभास तीन प्रकार का है—( १) साधारणजन का मुनिपत्नी,
राजपत्नी आदि विषयक, ( २ ) बहुनायकाश्रित-नायिकाविषयक और अनुभयनिष्ठ
( एकपक्षीय ) । क्रमशः तीनों का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—
सैकड़ों उपायों के द्वारा किसी-किसी तरह ( कड़े पहरे के बावजूद बड़ी
कठिनाई से ) राजमहल के ऊपरी प्रकोष्ठ में पहुँच कर पुण्यवान् कोई युवक एकान्त में
अमृतफेन-तुल्य स्वच्छ फूल की शय्या पर सोई हुई कृशाङ्गी (विरह के कारण दुबली )
राजपत्नी को जगाकर उस चकित आँखों वाली मुस्कानभरी रमणी को दीर्घ निःश्वास
लेता हुआ आलिङ्गित कर लेता है, यह आश्चर्य है ।
यहाँ आलम्बन विभाव अनुचित (परपुरुष में) प्रेम करने वाली राजा की
रमणी है । एकान्त एवं रात आदि उद्दीपन विभाव है । साहसपूर्वक राजा के महल
( रनिवास ) में जाना, प्राणों की उपेक्षा, निःश्वास, आलिङ्गन आदि अनुभाव हैं और
शंका आदि संचारीभाव हैं । निषिद्ध ( अनुचित ) आलम्बन ( नायक-नायिका ) वाली
इस रति के कारण यहाँ रस का आभास है । अर्थात् यह अनुचित आलम्बन वाले
रसाभास का उदाहरण है ।