रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० रसगङ्गाधरः
तत्र रसाद्याभासत्वं रसत्वादिना न समानाधिकरणं, निर्मलस्यैव रसादि-
त्वात्, 'हेत्वाभासत्वमिव हेतुत्वेन' इत्येके। नह्यनुचितत्वेनात्महानिः, अपि तु
सदोषत्वादाभासव्यवहारः, अश्वाभासादिव्यवहारवद् इत्यपरे।
विभावः समुचित एव, किन्तु तत्र रतिरेवानुचितेत्याशयः। रत्यादिरिति। नवीनमतेऽ-
नुचितस्थायिभावत्वं रसाभासत्वमित्येव लक्षणम्। आदिपदेन हासशोकादीनां ग्रहणात्।
प्राग्वदिति। लोकव्यवहारत इति भावः।
तत्रेति। रसाभासे। रसस्य भावस्य वा आभासत्वं प्रतिकृतिरूपेण ज्ञानं रस-
त्वेन न व्यवहार्यम्। निर्मलस्य दोषरहितस्य। यथा—कार्यसाधकत्वेऽपि हेतुरिवा-
भासमानो हेत्वाभासोऽसद्धेतुर्न हेतुत्वेन कार्यसाधकरूपेण व्यवहृतो भवति, यथा वा
साहित्ये विरोधाभासो न विरोधस्तथैव रसाभासो न रसः, किन्तु भिन्न एव रसवदा-
भासते—इत्येकेषामाचार्याणां मतम्।
अपरम्--नुसारेण रसाभासोऽपि रस एवेत्युभयोः सामानाधिकरण्यमेव। रसा-
भासस्य अनौचित्यमेव बीजम्, तत्तु दोषरूपमेव। अनुचितत्वेन दोषसद्भावेन नैव
स्वरूपहानिः कीटविद्धरत्नादिवत्। आभासव्यवहारस्तु दोषयुक्तत्वादेव रसस्य आभासो
दोषो रसाभास इति। दुष्टोऽश्वोऽश्वाभासो, दुष्टो मनुष्यो मनुष्याभासो यथैव तथैव
दुष्टो रसो रसाभासः। दुष्टत्वञ्चात्रानौचित्यरत्यादिमत्त्वम्। रसलक्षणेऽनुचितस्थायिभाव-
निवारकस्यानुक्तत्वेन रसाभासेऽपि रसव्यवहारे न कापि बाधा। हेतुरपि दुष्टत्वे
विद्यमानोऽपि त्याज्यतयैव ज्ञायते नाभावतया। तस्माद् हेत्वाभासत्वेन दृष्टान्तोऽपि
समानाधिकरणे बाधक इति।
में भी अनुचितत्व आता है। बहुनायकविषयक रति में नायकगत बहुत्व ही दोष है और
एकपक्षीय रति में रत्यभावविशिष्टत्व ही अनुचितत्व है, जो आलम्बन में ही है।)
रसाभास को रस मानें या न मानें—इस विषय में दो मत दिखाते हैं। रस
और भाव के आभास का रस के साथ समानाधिकरण नहीं है—दोनों एक स्थल में
नहीं रह सकते, क्योंकि निर्मल (निर्दोष) को ही रस कह सकते हैं और जैसे हेत्वाभास
(दुष्ट हेतु) का हेतुरूप में ग्रहण नहीं होता है (और साहित्य में विरोधाभास का
विरोध के द्वारा ग्रहण नहीं होता) वैसे ही रसाभास का रस के रूप में ग्रहण उचित
नहीं है—यह कुछ विद्वानों का मत है।
किसी के अनुचित रहने पर स्वरूप की हानि नहीं होती, दोषयुक्त रहने के
कारण ही इसे आभास कहा गया है, जैसे दुष्ट (बुरी चाल वाले) घोड़े को अश्वाभास
कहते हैं, वैसे ही अनुचित विभाव वाले रस को ही रसाभास कहते हैं—ऐसा अन्य
आचार्य का मत है।