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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 414 में से

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पृष्ठ 371

प्रथमाननम् ३३९
‘अनुचितमिति’ धोरिति केचित् । तदपरे न क्षमन्ते, मुनिपत्न्यादिविषयक-
रत्यादेः संग्रहेऽपि बहुनायक-विषयाया अनुभयनिष्ठायाश्च रतेरसंग्रहात्, तत्र
विभावगतानौचित्यस्याभावात् । तस्मादनौचित्येन रत्यादिर्विशेषणीयः । इत्थं
चानुचितविभावालम्बनाया बहुनायकविषयाया अनुभयनिष्ठायाश्च संग्रह इति ।
अनौचित्यं च प्राग्वदेव ।
केचिदिति । प्राचीनाचार्याः पण्डितराजश्चेति । सूत्रे आलम्बनविभाव एव,
अनौचित्यस्य विशेषितत्वात् । बहुनायकविषया रतिर्हि नायकगतबहुत्वानौचित्यादेवानु-
चिता, अनुभयनिष्ठा रतिरपि रत्यभावविशिष्टालम्बनानौचित्यादेवानुचितेति प्राचीन-
मतेऽनुपदमेवाक्षितदोषस्योद्धाराच्च ।
अपर इति । नवीना इत्यर्थः । बहुनायक-रतिस्थले एकतरनिष्ठरतिस्थले च
विभाव में सामाजिकों को ‘‘अनुचित है’’ इस प्रकार का बोध हो, उससे उत्पन्न भाव
रस न होकर रसाभास कहलाता है—ऐसा किन्हीं (प्राचीनों) का मत है । (पण्डितराज
का भी यही मत है, क्योंकि सूत्र में भी यही है। यहाँ ‘लोकानां’ के स्थान में ‘सहृद-
यानां’ कहना ही उचित है। लोक में तो विवाहिता से अतिरिक्त सभी को रति के
अनुचित माने जाने पर भी सहृदयजन बहुधा परकीया का वर्णन कर देते हैं।
उनके लिए शृंगार रस का अनुचित विभाव के रूप में यह कहा जा सकता है कि
परस्पर अनुरक्त स्त्रो-पुरुष में कोई एक-दूसरे का पूज्य, बहुत पुरुषों में अनुरक्त स्त्री
और दोनों में एक अनुरागहीन । ऐसा इसलिए कहा गया कि आगे मूल में ही ‘परस्त्री’
कहने के स्थान में मुनिपत्न्यादि का उल्लेख किया है। वस्तुतः तीन प्रकार की ही
नायिका उचित है, शेष अनुचित ही है—( १ ) स्वीया, स्वपरिणययोग्य कुमारी एवं
वेश्या) ।
पूर्वोक्त मत कि अनुचित विशेषण विभाव का है, इसको अन्य (नवीन) आचार्य
नहीं मानते हैं, क्योंकि पूर्वमत में मुनिपत्नी आदि विषयक रति के संग्रह (अनुचित रूप
में ) होने पर भी अनेक नायक-विषयक एवं दोनों (स्त्री-पुरुषों) में न रहकर एक में
ही रहने वाली रति का अनुचित रूप में संग्रह नहीं हो पाता है, क्योंकि वहाँ ( बहु-
नायकस्थल एवं एकपक्षीय प्रेमस्थल में ) विभावगत अनौचित्य नहीं है। अतः
रसाभास के लक्षण में अनौचित्य से रति, हास, शोक आदि स्थायीभावों को विशेषित
करना चाहिए । अर्थात् अनुचित स्थायीभाव के रहने पर वहाँ रसाभास होता है।
इस तरह अनुचित आलम्बन विभाव वाली, बहुत नायक में एक नायिका का अनु-
राग वाली एवं एकपक्षीय इन तीनों रतियों का संग्रह हो जाता है। इस द्वितीय मत
में भी अनौचित्य का विवरण पूर्वप्रतिपादित के समान ही होगा ।
( यहाँ पूर्वमत में भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि आलम्बनगत दोष से ही रति
२४ र०