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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

प्रथमाननम् ३३७
चेद्, न; उक्तेष्वेवैषामन्तर्भावेण संख्यान्तरानुपपत्तेः, असूयातो मात्सर्यस्य,
त्रासादुद्वेगस्य, अवहित्थाख्याद् भावाद् दम्भस्य, अमर्षादीर्ष्यायाः, मतेर्विवेक-
निर्णययोः, दैन्यात् क्लैब्यस्य, धृतेः क्षमायाः, औत्सुक्यात् कुतुकोत्कण्ठयोः,
लज्जाया विनयस्य, तर्कात् संशयस्य, चापलाद् धाष्टर्यस्य च वस्तुतः सूक्ष्मे
भेदेऽपि नान्तरीयक तया तदनतिरिक्तस्यैवाध्यवसायात्, मुनिवचनानुपालनस्य
सम्भवे उच्छृङ्खलताया अनौचित्याच्च ।
कथमौचित्यम् । उक्तेष्वेव = त्रयस्त्रिंशद्भावेषु गतार्थत्वादेषां पृथग नोल्लेख इति संख्या-
नियमः समुचित एव इत्युत्तरम् ।
नान्तरीयकेति । असूया-मात्सर्ययोः, त्रासोद्वेगयोरित्यादिषु यद्यपि सूक्ष्मतया
भेदोऽस्ति, तथापि तत्तदुदाहरणे उभयोरविनाभावो दृश्यते । यत्र मात्सर्यं तत्र अनिवार्य-
तोऽसूया भवत्येव, एवमेव त्रामादिस्थले उद्वेगादयः । अत एव मात्सर्यादीनां पृथग्लक्षणम-
कृत्वैव असूयादिलक्षणमेव तथा कृतं येन तत्र तदनतिरिक्तानां = मात्सर्यादिसहितानामेव
असूयादित्वेन अध्यवसायो बोधो भवति । मुनिवचनेति । भरतेन 'एकोनपञ्चाशद्भावाः'
इति नाट्यशास्त्रे सप्तमाध्याये निरूपितम् - अष्ट स्थायिभावाः, अष्ट सात्त्विकभावाः,
त्रयस्त्रिंशच्च व्यभिचारिभावाः । शमसहिताः पञ्चाशद्, देवादिविषयक-रतिसहिताश्च
एकपञ्चाशद् भावा इति । मूलतः स्थायिसात्त्विक-व्यभिचारिणां सङ्कलनेन ४९ एकोन-
पञ्चाशद्भावा मुनिसम्मताः । तेषां स्वीकरणसम्भवे उच्छृङ्खलतायाः तदुल्लङ्घनरूप
स्वातन्त्र्यस्य अनौचित्यादव्यवस्थापत्तेश्च संख्यानियमस्वीकरणमावश्यकमेव ।
भावरूप में ही उन-उन प्रयोगों में देखे जाते हैं । तो इनके रहने पर भावों की संख्या
बढ़ जानी चाहिए, ऐसा नहीं है, क्योंकि पूर्वोक्त ३३ भावों में ही इनके अन्तर्भाव हो
जाने से उक्त संख्या से अधिक संख्या उपपन्न नहीं होती । यद्यपि जिन-जिन भावों में
इन मात्सर्य आदि को गतार्थ करते हैं उन-उन से इनका सूक्ष्म भेद है ही; यथा—
असूया से मात्सर्य का, त्रास से उद्वेग का, अवहित्थ से दम्भ का, अमर्ष से ईर्ष्या का,
मति से विवेक और निर्णय का, दैन्य से क्लैब्य का, धृति से क्षमा का, औत्सुक्य से
कुतुक और उत्कण्ठा का, लज्जा से विनय का, तर्क से संशय का तथा चापल से धाष्ट्यं
का सूक्ष्मतर भेद रहने पर भी इनके अविनाभाव ( अनिवार्यरूप से परस्पर जुड़े रहने )
के कारण असूयादि का लक्षण ही ऐसा करेंगे कि उसके अन्तर्गत मात्सर्यादि भी आ
जायें, इससे भावों की संख्या वही रह जाती है । तात्पर्य यह है कि असूयादि स्थल में
मात्सर्यादि रहता ही है, उसे असूयादि के लक्षण से ही गतार्थ कर लेते हैं । भरतमुनि
के वचन का पालन न करने पर मनमानो स्वतन्त्रता अनुचित होगी और अव्यवस्था फैल
जायगी । उन्होंने भावों की संख्या ४९ बतलायी है—स्थायी-८, सात्त्विकभाव-८ और
"व्यभिचारीभाव-३३ = ४९ । शान्तरस के स्थायीभाव शम को लेकर भाव पचास हो
जाते हैं, जब कि देवादिविषयक रति को लेकर इक्यावन ।