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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 368, कुल 414 में से

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पृष्ठ 368

१३६ रसगङ्गाधरः
इदं वोदाहरणम्—
न धनं, न च राज्यसम्पदं, नहि विद्यामिदमेकमर्थये ।
मयि धेहि मनागपि प्रभो ! करुणाभङ्गितरङ्गितां दृशम् ॥
अत्र धनाद्यपेक्षाशून्यस्य भगवद्दयादृगन्तपाताभिलाषो हि भगवत्य-
त्यन्तानुरक्तिं व्यनक्ति ।
एवं संक्षेपेण निरूपिता भावाः ॥
'अथ कथमस्य संख्यानियमः, मात्सर्योद्वेग-दम्भेर्ष्याविवेक-निर्णय-क्लैब्य-
क्षमा-कुतुकौत्कण्ठा-विनय-संशय-धार्ष्ट्यादीनामपि तत्र तत्र लक्ष्ये दर्शनादिति
ध्वनिरेवात्रेति चेन्न, तादृशेन वस्तुना चरमप्रतीतिकाले कविगताया रतेरेव स्फुटतया
प्रतीतेरत्र भावध्वनित्वमेव ।
यदि वस्तुध्वनिरेवात्र प्रधानं न भावध्वनिरित्येवाग्रहस्तर्हि वस्तुध्वन्यसम्पृक्त-
मुदाहरणान्तरं प्रस्तौति —न धनमिति । हे प्रभो भगवन् ! अहं त्वत्तो न तु धनं, न
वा राज्यं, न वा विद्यामेव, अपि तु एकमेव वस्तु अर्थये याचे यत् त्वं मनागपि ईषदपि
मयि भक्ते दयासङ्केतोच्छलितां दृष्टिं धेहि ।
संक्षेपेणेति । भेदादि-विस्तारं विनैव । त्रयस्त्रिंशत्संख्याकाः व्यभिचारिभावा
निरूपिताः ।
अस्य = भावस्य । संख्यानियम इति । त्रयस्त्रिंशदेव व्यभिचारिभावा,
न ततोऽधिका इति नियमः कथमिति प्रश्नः । उद्वेगस्यावेगपर्यायत्वेन मूलकृतैवोक्तत्वान्नात्र
तथापि उस प्रकार के भगवान् के ऐश्वर्य से प्रकाशित कविगत भगवद्विषयक रति का
ध्वनित होना स्थिर ही है । वस्तु के द्वारा अन्ततः रतिभाव का ही प्रकाशन होता है ।
अथवा रतिभाव का स्वतन्त्र ( वस्तु से अमिश्रित ) उदाहरण—
हे प्रभो ! मैं आप से न धन, न राज्यसम्पत्ति और न विद्या ही मांगता हूँ,
अपि तु यह एक मात्र मेरी याचना है कि आप मुझ पर थोड़ी भी दयाभरी चेष्टा से
उछलती हुई दृष्टि डाल दें ।
यहाँ धन आदि की अपेक्षा से शून्य किसी भक्त की 'भगवान् के द्वारा दया-
दृष्टिपात की अभिलाषा' भगवान् में अत्यन्त अनुराग को व्यक्त कर रही है ।
इस प्रकार संक्षेप में ( भेद-निरूपण को छोड़कर ) चौंतीस व्यभिचारिभावों
( भावध्वनियों ) का निरूपण सम्पन्न हुआ ।
अब प्रश्न उठता है कि इन भावों की संख्या ३३ ही है, ऐसा नियम कैसे करते
हैं ? क्योंकि इनसे अतिरिक्त मात्सर्य ( दूसरे की उन्नति से जलन ), उद्वेग (उत्तेजना),
दम्भ ( घमंड ), ईर्ष्या, विवेक, निर्णय, क्लैब्य ( पौरुषहीनता ), क्षमा, कुतुक
( उत्सुकता ), उत्कण्ठा ( आकांक्षा या लालसा ), विनय, संशय, धृष्टता आदि भी