रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३१३
तदुक्तम्—
अनुभाव-पिधानार्थेऽवहित्थं भाव उच्यते ।
तद् विभाव्यं भय-व्रीडा-धार्ष्ट्य-कौटिल्य-गौरवैः ॥
यथा—
प्रसङ्गे गोपानां गुरुषु महिमानं यदुपते-
रुपाकर्ण्य स्विद्यत्पुलकितकपोला कुलवधूः ।
विषज्वालाजालं झगिति वमतः पन्नगपतेः
फणायां साश्चर्यं कथयतितरां ताण्डवविधिम् ॥
अत्र व्रीडा विभावः । तादृश-कालियकथाप्रसङ्गोऽनुभावः । एवं भयादि-
प्रयोज्यमप्युदाहार्यम् ।
गोपनाय निगूहनाय उत्पन्नो भावोऽवहित्थम् । अत्र विभावो व्रीडादिः, अनुभावश्च
हर्षादिगोपनचेष्टादिः ।
अत्र प्राचीनाचार्यसम्मतिं दर्शयति—तदुक्तमिति । अनुभावस्य हर्षादिजनि-
तरोमाञ्चादेः, पिधानार्थे गापनार्थे जनितो भावोऽवहित्थमुच्यते । तद् अवहित्थं,
भयादिभिर्विभावैर्विभावनीयम् । यथा—प्रसङ्ग इति ।
गोपानां मुखात् कथाप्रस्तावक्रमे गुरुजनानां समक्षमेव यदुपतेः श्रीकृष्णस्य
महिमानम् उपाकर्ण्य श्रुत्वा कुलवधूः गोपकुलाङ्गना काचित् स्वेद-पुलकयुक्तगण्डस्थला
जाता । श्रीकृष्णप्रेम्णा पुलकभावप्रकाशो गुरुजन-समीपे नोचित इति मनसि निधाय सा
तद्गोपनाय विषज्वालाराशिं झगिति 'अतिशीघ्र' वमत उद्गिरतः पन्नगपतेः कालिय-
पात, रोमांच आदि ) को छिपाने के लिए उत्पन्न भाव-विशेष ( एक प्रकार के भाव )
को अवहित्थ कहते हैं ।
जैसा कि कहा गया है—
अनुभाव को छिपाने के लिए उत्पन्न भाव को अवहित्थ कहा जाता है । वह
भय, लज्जा, धृष्टता, कुटिलता और गौरव से प्रकाशित होता है । उदाहरण—
गोपों के मुख से कथावर्णन-क्रम में गुरुजनों ( ससुर आदि ) के समक्ष ही
श्रीकृष्ण के गुणवर्णन को सुनकर गोपकुलवधू के गालों पर ( प्रेमवश ) आनन्द के
कारण जलकण उछल पड़े । तब वह विष की ज्वालाओं को तुरन्त वमन करते हुए
सर्पराज कालिय नाग के फणा पर श्रीकृष्ण के ताण्डव नृत्य करने की घटना को आश्चर्य
से कहने लगी । ( तात्पर्य यह कि यह गाल पर जलकण, इस घटना की वजह से ही
प्राप्त हैं, न कि प्रेम से । )
यहाँ लज्जा विभाव है । इस प्रकार को कालिय-कथा अनुभाव है । इसी तरह
भय के कारण भी हर्षादि के छिपाने का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ।