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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 344

३१२ रसगङ्गाधरः
शोणाग्राभ्यां भामिनी लोचनाभ्यां
जोषं जोषं जोषमेवावतस्थे ॥
इह त्वाकस्मिक-स्तनाग्रस्पर्शो विभावः । नयनारुण्यनिर्निमेषनिरीक्षणे
अनुभावौ । ननु क्रोधामर्षयोः स्थायि-सञ्चारिणोर्भावयोः किं भेदकमिति चेद्,
विषयतावैलक्षण्यमेवेति गृहाण । तत्र तु गमकं झटिति परविनाशादौ प्रवृत्ति-
र्वचनवैमुख्यादिकं चेति कार्यवैलक्षण्यम् ।
व्रीडादिभिर्निमित्तैर्हर्षाद्यनुभावानां गोपनाय जनितो भावविशेषो-
ऽवहित्थम् ॥
सहसा आमृश्य संस्पृश्य ( अपराधं कृत्वा ताडनभीत्या ) द्राग् झटिति दूरे यातस्य
प्रियस्य कृतापराधस्य रमणस्य, आननाब्जं मुखकमलं शोणाग्राभ्याम् कोपादीषद्रक्ताभ्यां
लोचनाभ्यां, जोषं जोषं दृष्ट्वा-दृष्ट्वा, भामिनी कोपनस्वभावा नायिका, जोषं तूष्णीमेव
अवतस्थे स्थितवती । जोषं जोषमिति णमुलन्तं 'जुपो प्रीतिसेवनयोरिति'धातोः ।
लोचनाभ्यां सेवनं दर्शनमेव ।
इह त्विति । अमर्षलक्षणे परकृतावज्ञा विभावत्वेनोक्ता, इह तु आदिपदेन
ग्राह्य आकस्मिककुचस्पर्श एव । क्रोधः स्थायी भावः, अमर्षस्तु संचारिभावः समान
एव प्रतीयते । तथापि उभयोः वस्तुगतवैलक्षण्येन पार्थक्यमस्ति । क्रोधे झटिति पर-
विनाशे प्रवृत्तिः, अमर्षे तु वचनवैमुख्यादिकमित्येव भेदः । किञ्च परकृतावज्ञादिजन्यस्य
भावस्य अनुत्कटावस्थाऽमर्षस्तेन मौनादिकार्यं जायते, तस्यैव उत्कटावस्था क्रोधस्तेन
क्षिप्रमेव परविनाशे प्रवृत्तिरूपं कार्यं जायते । इत्युभयोः कार्यमेव विषयतावैलक्षण्यं
ज्ञापयतीति ।
अवहित्थं भावं निरूपयति—व्रीडादिभिरिति । लज्जा-भयवञ्चना-धूर्त्ततादिभिः
कारणैर्विभावस्वरूपैः, हर्षोत्सुक्यादिजनितानामनुभावानामश्रुपात-रोमाञ्चमुखविकासादीनां
शीघ्र ही दूर भागे हुए प्रिय के मुख-कमल को कोपनस्वभावा नायिका लाल-लाल
आँखों से देख-देखकर चुप ही रही ।
यहाँ आकस्मिक रूप से स्तनाग्रस्पर्श विभाव तथा आँख लाल होना, अपलक
देखना आदि अनुभाव है । अब यहाँ शंका करते हैं कि स्थायीभाव क्रोध और संचारी-
भाव अमर्ष में क्या भेदक तत्त्व है, तो इसका उत्तर है कि भेदक तो कोई नहीं, पर
विषय के धर्म का विलक्षण होना ही भेदक है । अर्थात् परकृत-अपमान से उत्पन्न
सामान्य कोप अमर्ष एवं उत्कट कोप क्रोध है । इसमें नियामक कार्य का वैलक्षण्य ही
है कि क्रोध में परविनाश के लिए झट से प्रवृत्ति होती है, जब कि अमर्ष में वचन देने
से विमुख होना आदि ही होता है ।
लज्जा, भय, धृष्टता आदि कारणों से हर्ष, औत्सुक्य आदि के अनुभावों (अश्रु-