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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 343

प्रथमाननम् ३११
विबोधस्य चेतनापदवाच्यत्वात् ।
यथा कश्चित् सत्यप्रतिज्ञो द्वाभ्यां नायिकाभ्यां द्वौ कालावुपभोगार्थं
दत्त्वा यथोचिते काल एकामुपभुज्य कालान्तरे प्रवृत्ते तां विहायापरां भुङ्क्ते,
तथैवायं रात्रौ निद्रां, प्रातश्चेतनामिति समासोक्तेरेवेह प्रकाशनात् ।
परकृताऽवज्ञादि-नानापराधजन्यो मौन-वाक्पारुष्यादि-कारणीभूत-
श्चित्तवृत्तिविशेषोऽमर्षः ॥
प्राग्वत् कारणानां कार्याणां च क्रमेण विभावानुभावत्वम् ।
उदाहरणम्—
वक्षोजाग्रं पाणिनाऽऽमृश्य दूरे
यातस्य द्रागाननाब्जं प्रियस्य ।
वस्थां ( विबोधम् ) आलिलिङ्ग । अत्र विबोधस्य प्रतीतावपि चेतनापदेन तस्य वाच्याय-
मानत्वान्न भावत्वम् । समासोक्त्यलङ्कारस्यैवात्र प्राधान्यम् ।
अथामर्षं निरूपयति—परकृतेति । अन्येन केनापि कृता या अवज्ञा तिरस्कारः
प्रतिकूलाचरणादिश्च तज्जन्यं यत् स्वस्मिन् तूष्णीम्भाव-कठोरभाषण-लोचनवक्रत्वादि
तत्कारणमेवामर्षः असहिष्णुता । प्राग्वद् विबोधभाववत् । अमर्षस्य विभावः पर-
कृतापराधः, अनुभावास्तु मौनवाक्पारुष्यादयः ।
अमर्षमुदाहरति—वक्षोजेति । पाणिना स्वकरेण वक्षोजाग्रं नायिकायाः स्तनाग्रं
यहाँ प्रयुक्त 'चेतना' पद का वाच्यार्थ ही विबोध है, जो व्यंग्य न होने के
कारण भाव नहीं बन सकता ।
जैसे कोई नायक अपने वचन की सत्यता पर दृढ़ रहकर अपनी दो नायिकाओं
के उपभोग के लिए दो ( भिन्न-भिन्न ) समय देकर यथोचित समय पर एक (नायिका)
का उपभोग कर दूसरे समय में पहली को छोड़कर दूसरी का उपभोग कर दूसरे समय
में पहली को छोड़कर दूसरी का उपभोग करता है, वैसे ही यह व्यक्ति रात में निद्रा को
और सुबह में चेतना को आलिंगित करता है—इस प्रकार की समासोक्ति ( श्लेषयुक्त
विशेषणों के द्वारा प्रकृत के साथ अप्रकृत का भी उपस्थापन ) ही यहाँ प्रकाशित हो
रही है । अतः यह भावध्वनि न होकर अलङ्कारध्वनि ही है ।
अब अमर्ष भाव का निरूपण करते हैं—दूसरे के द्वारा किये गये अपमान,
विरुद्धकार्य आदि अनेक अपराधों से उत्पन्न तथा चुप होना, कठोर वचन, आँख तानना
आदि का कारण जो चित्तवृत्ति उसे ही अमर्ष कहते हैं ।
पूर्वभाव ( विबोध ) के समान ही यहाँ भी अमर्ष के कारण एवं कार्य क्रमशः
इसके विभाव एवं अनुभाव हैं। अर्थात् परकृतापराध विभाव एवं मौन-वाक्पारुष्यादि
अनुभाव होते हैं। उदाहरण—
( नायिका के ) स्तन के अग्रभाग को हाथ से छू-कर ( मार खाने के डर से )