रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० रसगङ्गाधरः
न तु वारिवाहविषयाया असूयाया एवात्र वाक्यार्थतेति शङ्क्यम्,
विबोधप्रतीतौ हि सत्यां तस्मिन्नौचित्यावगमे सत्यनुचित-विबोधजनकत्वेन
वारिवाहेऽसूयाया विलम्बेन प्रतीतेः, परमुखनिरीक्षकत्वात् । स्यादपि तस्या
अपि प्राधान्यम्, यदि वारिवाहे निष्करुणत्वादिवोधकं किञ्चिदपि स्यात् । नापि
स्वप्नस्य, वारिवाहनादेन तन्नाशस्यैव प्रतिपत्तेः । अस्तु वा स्वप्नभावप्रशमेना-
सूयया च सहास्य सङ्करः ।
इदन्तु नोदाहार्यम्—
गाढमालिङ्ग्य सकलां, यामिनीं सह तस्थुषीम् ।
निद्रां विहाय स प्रातरालिलिङ्गाथ चेतनाम् ॥
न त्विति । अत्र 'न चेति' पाठ एवोचितः । पूर्वोपन्यस्तोदाहरणे “नितरां
हितयेति” पद्ये सिंहावलोकनन्यायेन शङ्कते--न त्विति । वस्तुतः "केचिद्” इति
मतप्रदर्शनात्पूर्वमेवास्याः शङ्काया उपस्थापनं सुसङ्गतम् । यद्यप्यत्र मेघविषया असूया
प्रतीयते, तथापि सा न प्रधानम्, विबोधानन्तरमेव तस्याः प्रतीतिः, असूयाप्रतीतेः
कारणं विबोध एवात्र प्रधानम् । असूयाया विबोधज्ञानसापेक्षत्वमेव तस्याः परमुख-
निरीक्षकत्वरूपं गौणत्वम् । स्वप्नस्येति, वाक्यार्थता, प्राधान्यमितियावत् । यदि
सहृदयैः असूया स्वप्नश्च स्वातन्त्र्येण गृह्येते, तर्हि ताभ्यां सह विवोधस्यात्र सङ्करः
स्वीकार्यः । तत्रापि विबोधस्यैव मुख्यतेत्याशयः !
गाढेति । स नायकः सकलां यामिनीं रात्रिमभिव्याप्य गाढमालिङ्ग्य सह-
स्थितवतीं निद्रामेकां नायिकामिव प्रातःकाले विहाय अपरां नायिकामिव चेतनां जाग्रता-
विबोधभाव के पूर्वोक्त 'नितरां हितयाद्य' इस उदाहरण पर शंका करते हैं कि
यहाँ मेघविषयक असूया (ईर्ष्या) ही वाक्यार्थ है, प्रधान है। पर, ऐसी शंका उचित
नहीं है, क्योंकि पहले विबोध की प्रतीति होने पर उसमें औचित्यबोध के बाद अनुचित
विबोध के कारण मेघ में असूया की प्रतीति विलम्ब से होती है, कारण यह (असूया)
परमुखापेक्षी है, अर्थात् विबोधज्ञान पर अवलम्बित है। अतः यहाँ विबोध ही प्रधान
है। यदि कहें कि यहाँ स्वप्न ही प्रधान (वाक्यार्थ) है, तो यह भी उचित नहीं है,
क्योंकि मेघगर्जन से उसके (स्वप्न के) नाश की ही प्रतीति होती है। यदि कहें कि
असूया का प्राधान्य सहृदयानुमोदित है, तो यह भी मान सकते हैं कि स्वप्नभाव के
प्रशमन और असूया के साथ विबोध भाव का संकर (सम्मिश्रण) यहाँ है। पर,
उसमें भो प्राधान्य विबोध का ही रहेगा।
विबोधभाव के लिए इसे तो नहीं उदाहृत किया जा सकता है—
किसी नायक ने पूरी रात साथ-साथ रहने वाली निद्रा को कसके आलिङ्गित
करके सुबह में उसे छोड़कर चेतना (जाग्रतावस्था) को आलिङ्गित कर लिया।