रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् ३०९
नितरां हितयाऽद्य निद्रया मे, बत ! यामे चरमे निवेदितायाः ।
सुदृशो वचनं शृणोमि यावन्, मयि तावत् प्रचुकोप वारिवाहः ॥
अत्र गर्जितश्रवणं विभावः । प्रियावचनश्रवणोल्लासनाशोऽनुभाव-
स्तन्नेयः ।
केचिदविद्याध्वंसजन्यमप्येनमामनन्ति । तेषां मते—
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा, त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः, करिष्ये वचनं तव ॥
इतिगीतापद्यमुदाहार्यम् ।
विवोधः, सद्यो जागृतावस्थायां समुत्पन्नं ज्ञानमित्यर्थः । त एवेति निद्रापूर्ति-स्वप्ना-
वसानोच्चशब्द-कठिनस्पर्शादयः ।
नितरामिति । बत हन्त ! अद्य मे मम, नितरामतिशयेन हितया प्रियकारिण्या
निद्रया निवेदिताया उपस्थापितायाः, सुदृशः सुलोचनायाः प्रियाया वचनं चरमे यामे
रात्र्यन्तिमप्रहरे यावत् शृणोमि, तावत् वारिवाहो मेघः, मयि नायके, प्रचुकोप अति-
कुपितोऽभूत् । घनगर्जितेन मधुरस्वप्नो भग्न इत्याशयः । उन्नेय उद्भावनीयः ।
-विवोधलक्षणे मतान्तरमाह —केचिदिति । अविद्यायाः स्वकर्तृत्वाभिमानादि-
रूपायाः ध्वंसजन्यम् आत्मज्ञानं विवोध इत्यपि स्वीकुर्वन्ति । तदनुसारम् —
नष्टो मोहः इतिपद्यमत्रोदाहरणीयम् । मोहः अज्ञानं शरीरात्मवादादि नष्टम्,
स्मृतिः आत्मस्मरणं तत्त्वज्ञानं, हे अच्युत श्रीकृष्ण ! त्वत्प्रसादात् त्वदुपदेशाल्लब्धम् ।
इदानीं विगतसन्देहोऽहं स्थितोऽस्मि, ते तव वचनं करिष्ये पालयिष्यामीति । अत्र
अविद्याध्वंसजन्यस्य विबोधस्य स्पष्टत्वात्तदुदाहरणमुपन्यस्तम् ।
अन्त, तेज आवाज, जोरदार स्पर्श आदि, ये कारण ही विवोध संज्ञक भाव के विभाव
होते हैं । आँख मलना, देह का अंगड़ाई लेना आदि अनुभाव हैं ।
संक्षिप्त रूप से उदाहरण—
आज रात के अन्तिम पहर में अत्यन्त हितकारिणी निद्रा के द्वारा लायी गयी
सुन्दरी का वचन जब-तक मैं सुनने लगा, तभी मेरे ऊपर मेघ कुपित हो गया ।
यहाँ गरजने का शब्द सुनना विभाव है । प्रिया के वचन को सुनने के उल्लास
का नाश अनुभाव है, जो ऊह करने पर जाना जाता है । ( साक्षात् प्रतिपादित न होने
से गम्य है । )
कोई आचार्य अविद्या ( अज्ञान ) नाश से उत्पन्न आत्मसाक्षात्कार को ही
विबोध मानते हैं । उनके मत में इसका उदाहरण निम्नांकित गीता का पद्य हो सकता
है । ( उपर्युक्त उदाहरण नहीं )—
हे श्रीकृष्ण ! आपकी कृपा से मेरा अज्ञान नष्ट हुआ, ज्ञान प्राप्त हुआ । अब
मैं सन्देह-रहित हो चुका हूँ । इसलिए तुम्हारा वचन ही करूँगा ।