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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 414 में से

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पृष्ठ 340

३०८ रसगङ्गाधरः
एषा प्रवासगतस्य स्वप्नेऽपि प्रियामेवम्भाषिणीं दृष्टवतो निद्रां प्रति कस्य-
चिदुक्तिः। यद्यप्येवम्भूतायाः प्रियतमावस्थाया निवेदनेन "निद्रे मम भवत्या
महानुपकारः कृतः" इति वस्तु, विप्रलम्भशृङ्गारश्चात्र प्रतीतिपथमवतरति,
तथापि पुरःस्फूर्तिकतया स्वप्नध्वननमत्रोदाहृतं न प्रान्ते तयोर्ध्वननं
निरोद्धुमीष्टे ।
निद्रानाशोत्तरं जायमानो बोधो विबोधः ॥
निद्रानाशश्च तत्पूर्ति-स्वप्नान्त-बलवच्छब्द-स्पर्शादिभिर्जायत इति त
एवात्र विभावाः। अक्षिमर्दन-गात्रमर्दनादयोऽनुभावाः। तत्र संक्षेपेणोदाहरणम्—
उपस्थापयेत् ? न कोऽपीत्यर्थः । कीदृशीं प्रियाम् ? हे अकरुण ! प्रियादशां विस्मृत्य
निष्ठुरस्वरूप ! मिथ्याकथननागर ! मम अञ्चलं विमुञ्च, मया तव नायकस्य स्नेहः
सम्यक्तया परिचितः, तव स्नेहः कृत्रिमो, न वास्तविक इत्यर्थः, इत्येवं भाषिणीम् ।
किञ्च धाराप्रवाह-निपतदश्रुयुक्ताम्, परित्यक्तालङ्काराञ्चेति ।
विभावोऽत्र निद्रा, अनुभावश्च मुखविकास-हस्तसञ्चारादिः आक्षेप लभ्यः । स्वप्न-
ध्वननमत्र प्राथम्येनोपस्थाय प्राधान्यं भजते । वस्तु-रसध्वनिद्वयस्य पश्चाद्भावित्वेन
अप्राधान्यम् । स्वप्नध्वननं हि प्रान्ते अन्ते, तयोः वस्तुरसध्वन्योः ध्वननं न निरोद्धुं
समर्थम् । अङ्गितया स्वप्नभावः, अङ्गत्वेन च वस्तु-रसध्वनी अत्र विराजन्त एव ।
विबोधं लक्षयति—निद्रानाशेति । निद्राभङ्गानन्तरमुत्पद्यमानं प्रकृतिस्थं ज्ञानं
को दिखा सकता है ? अर्थात् कोई नहीं । स्वप्न में वह प्रिया धारा-प्रवाह आँसू बहा
रही थी, आभूषणों को उतार चुकी थी और मुझे कह रही थी कि हे निष्ठुर ! महा-
मिथ्यावादी ( झूठे का सागर ) ! मेरी आँचल छोड़ो, तेरे स्नेह को मैंने भलीभाँति
जान लिया है !
यह उक्ति प्रवास-गत किसी नायक की है, जो स्वप्न में प्रिया को इस प्रकार
देखकर निद्रा से कह रहा है ।
यद्यपि इस प्रकार की प्रियतमावस्था के निवेदन से—( १ ) निद्रे ! आपने
मेरा महान् उपकार किया—ऐसा वस्तुध्वनि और ( २ ) विप्रलम्भ शृङ्गार यहाँ जाना
जाता है, तथा उनसे पहले ही स्वप्नभाव की स्फूर्ति होने से उसी भावध्वनि के रूप
में इसे यहाँ उदाहरण के रूप में रखा गया है । परन्तु यह ध्वनि अपने बाद अन्त में
उन दोनों ( वस्तु एवं शृंगार ) ध्वनि को रोकने में समर्थ नहीं है । अर्थात् ये ध्वनियाँ
भी यहाँ होते ही हैं । प्रथमोपस्थिति के कारण स्वप्नध्वनि प्रधान है ।
निद्रानाश के बाद होनेवाले ज्ञान को विबोध कहते हैं ।
निद्रा का नाश अनेक कारणों से होता है, जैसे—निद्रा पूर्ण होना, स्वप्न का