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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 337

प्रथमाननम् ३०५
विरहोऽत्र विभावः, अङ्गक्षेपादिरनुभावः ।
भीरोर्घोरसत्त्वदर्शन-स्फूर्जथु-श्रवणादिजन्मा चित्तवृत्तिविशेषस्त्रासः ॥
अनुभावाश्चास्य रोमाञ्च-कम्प-स्तम्भ-भ्रमादयः । यदाहुः—
औत्पातिकैर्मनःक्षेपस्त्रासः कम्पादिकारकः ॥
उदाहरणम्—
आलीषु केली-रभसेन बाला, मुहुर्ममालापमुपालपन्ती ।
आरादुपाकर्ण्य गिरं मदीयां, सौदामिनीयां सुषमामयासीत् ॥
दत्तस्य गुरुकुलमिति गुरुद्वारा देवदत्तस्य कुलेऽप्यन्वयाद्यथा समासस्तथैवेति । यतस्ततो
मुहुर्वारं वारं स्वाङ्गानि क्षिपन्ती, सखीनां तदुदन्तपरे तस्य नायकस्य य उदन्तो वृत्तान्तः
तद्वर्णनपरायणे मुखे इयं नायिका अतिदीनां दृष्टिम् आदधति । सखीनां कृते प्रयुक्ते मुख-
शब्दे एकवचनेन सर्वासां मुखे एक एव वृत्तान्तो नायकागमनसंकेतरहितः सूच्यते ।
त्रासाख्यभावमाह—भीरोरिति । भीरोर्भयशीलस्य, घोरसत्त्वानि व्याघ्र-
वराहादयः तेषां दर्शनेन, स्फूर्जथुः वज्रपातशब्दः तच्छ्रवणेन, आदिना विकृताकारपुरुष-
दर्शनेन चोत्पन्नः कम्पादिजनको मनोधर्मस्त्रासशब्देनोच्यते ।
घोरसत्त्वदर्शनादिर्विभावः, तज्जन्या रोमाञ्चादयोऽनुभावाः ।
औत्पातिकैरिति । उत्पातेन भव औत्पातिको वज्रनिर्घोषादिः तेनोत्पन्नो
मनःक्षेपो मनसो व्याकुलीभावः कम्प-रोमाञ्चादिजनक एव त्रासः । यथा—
आलीष्विति । नायकः सखायं वक्ति—सा बाला मुग्धा मत्प्रिया, केलीरभसेन
विलासकथनकौतुकेन, आलीषु सखीनां मध्ये, मुहुरनेकशः मम सम्बन्धिनम् आलापं
बार बार इधर-उधर फेंक रही है । सखियों ने जब उसके मन बहलाने के लिए उस
नायक के सम्बन्ध में बातें छेड़ीं तो यह अत्यन्त दीन होकर दृष्टि डाल रही है ।
यहाँ विरह विभाव और अङ्गक्षेपणादि अनुभाव है ।
डरपोक (भीरु) के मन में भयानक जीव के देखने या मेघ गर्जन सुनने से
उत्पन्न चित्तवृत्ति को त्रास कहते हैं ।
इसके विभाव घोरसत्त्वदर्शनादि और अनुभाव रोमाञ्च, कम्प, चेष्टाहीनत्व,
भ्रम आदि हैं । जैसा कि कहा है :—उत्पात करने वाले वस्तुओं या प्राणियों से उत्पन्न
मन की बेचैनी को त्रास कहते हैं, जो कम्प आदि को उत्पन्न करता है ।
(जैसे अमर्ष भाव के प्रसंग में मूलकार ने शंका की है कि स्थायीभाव क्रोध
और संचारी भाव अमर्ष में क्या भेद है ? वैसे ही यहाँ भी भयानक रस का स्थायीभाव
भय और इस संचारी भाव त्रास में क्या भेद है ? यह प्रश्न उठ सकता है । दोनों का
समाधान विषयता-वैलक्षण्य ही है । अर्थात् वही डर उत्कट दशा में भय और अनुत्कट
दशा में त्रास होगा ।) उदाहरण—
नायक कहता है कि वह बाला (मेरी मुग्धा प्रिया) क्रीडाकौतुकवश सखियों के