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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 336

३०४ रसगङ्गाधरः
रोगविरहादिप्रभवो मनस्तापो व्याधिः ।
गात्रशैथिल्य-श्वासादयोऽत्रानुभावाः । यदाहुः—
एकैकशो द्वन्द्वशो वा त्रयाणां वा प्रकोपतः ।
वातपित्तकफानां स्युर्व्याधयो ये ज्वरादयः ॥
इह तत्प्रभवो भावो व्याधिरित्यभिधीयते ॥
उदाहरणम्—
हृदये कृतशैवलानुषङ्गा, मुहुरङ्गानि यतस्ततः क्षिपन्ती ।
तदुदन्तपरे मुखे सखीनाम्, अतिदीनामियमादधाति दृष्टिम् ॥
स्थितत्वाद् भावध्वनितामधिरोहति । शान्तस्तु तदनन्तरभावीति विलम्बितत्वान्न
प्रधान इति ।
व्याधिभावं लक्षयति—रोगेति । यद्यपि व्याधिशब्दो रोगपर्याय एव,
तथापि साहित्यशास्त्रे चित्तवृत्तिविशेषो रोगादिजन्यो गृह्यते । वात-पित्त-कफानां समेषा-
मन्यतमानां वा प्रकोपाद् रोगो जायते । प्रियविश्लेषो हि विरहस्तज्जन्यस्तापो दुःखं
व्याधिभावः कथ्यते ।
एकैकश इति । वात-पित्त-कफानां शरीरस्य व्यवस्थापकतत्त्वानां प्रकोपतः
अन्यतमस्य सर्वेषां वा विकृतावस्थापन्नत्वात् दोषतापन्नत्वात् ज्वरादयो व्याधयो
रोगास्त्रिदोषोत्पन्नाः । इह काव्यशास्त्रे तत्प्रभवो ज्वरादिव्याध्युत्पन्नस्य भावस्य व्याधि-
संज्ञास्ति ।
उदाहरति—हृदय इति । इयं वियोगिनीहृदये कृतः शैवलस्य अनुषङ्गः
सम्पर्कों यया तादृशी । अत्र कृत इत्यस्य हृदयपदसापेक्षत्वे कथं समास इति चेद् देव-
यहाँ विभाव और ‘हन्त’ पद से गम्य (प्रतीयमान) अपनी निन्दा अर्थात् राज-सेवादि
से विरति और तृष्णा का अभाव अनुभाव हैं ।
यहाँ यद्यपि वैराग्य की प्रतीति होने से शान्त रस की प्रतीति हो रही है, परन्तु
मति झट से चमत्कार लाती है, जब कि शान्त विलम्ब से । अतः यहाँ मति को ही
ध्वनि का पद मिल सकता है ।
रोग, विरह आदि से उत्पन्न मन के ताप (दुःख) को व्याधि कहते हैं ।
देह की शिथिलता, तेज श्वास आदि यहाँ अनुभाव हैं । जैसा कि कहा है :—
वात, पित्त और कफ इन तीनों में किसी एक के, दो के या तीनों के कुपित (उत्कट)
होने से जो ज्वर आदि होते हैं, उन्हें व्याधि कहा जाता है । इस साहित्यशास्त्र में
उस व्याधि से उत्पन्न भाव को ही व्याधि कहते हैं ।
यह विरहिणी हृदय पर शीतलता के लिए शैवाल के रखे जाने पर भी अङ्गों को