सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

प्रथमाननम् २९९
यदाहुः —
अध्वव्यायामसेवाद्यैर्विभावैरनुभावकैः ।
गात्रसंवाहनैरास्य-सङ्कोचैरङ्गमोटनैः ॥
निःश्वासैर्जृम्भितैर्मन्दैः पादोत्क्षेपैः श्रमो मतः ॥ इति ।
श्रमः खेदोऽध्वगत्यादेर्निद्राश्वासादिकृन्मतः ॥ इति च ।
अयं च सत्यपि बले जायते, शारीरव्यापारादेव जायते, न तु ग्लानिः ।
अतो ग्लानिः श्रमस्य च भेदः ।
दीर्घश्वासः, अङ्गसम्मर्दः स्वेनैव देहमर्दनं, निद्राऽऽलस्यादिः, एतेषां कारणस्वरूपः । एतेन
श्रमभावस्यानुभावो दर्शितः । खेदो दुःखं चित्तवृत्तिरेव श्रमभाव उच्यते ।
प्राचीनसम्मतिं दर्शयति—अध्वेति । अत्राध्वपदं श्रमकारणत्वेन अध्वगमनपरम् ।
मार्गगमन-व्यायाम-सेवाप्रभृतिभिः विभावैः, गात्रस्य शरीरस्य संवाहनैर्मर्दनैः, मुखसंकोचैः,
अङ्गतिर्यक्करणैः, दीर्घोष्णश्वासैः, जृम्भाकरणैः मन्दतया पादोत्क्षेपैश्चानुभावैः श्रमाख्यो
भावो जायते ।
इतरविपश्चिन्मतमप्याह—श्रम इति । अध्वगत्यादिकारणादुत्पन्नः खेद एव
श्रमो मतः, यो हि निद्रादिकारको भवति ।
ननु ग्लानिभावेऽपि खेद एव जायत इति तेनैवास्य श्रमस्य गतार्थतास्तु, इति
चेन्न, श्रमस्य सबलपुरुषेऽपि सत्त्वात् शारीरव्यापारादेव जन्यत्वात्, ग्लानेरतथात्वाच्च ।
यहाँ भी वही (मादक द्रव्य सेवन) विभाव है। अधिक वर्णों का उच्चारण
अनुभाव है। पद्य के पूर्वार्ध में ग्राम्य उक्ति (मुख में अधर देना) और उत्तरार्ध में
तरुणी के हाथ को कमल से उपमा देने के बजाय अपने हाथ को ही उपमा देना भी
मदभाव को ही पुष्ट कर रहे हैं।
अत्यधिक शारीरिक मिहनत से उत्पन्न एवं दीर्घ श्वास, देह मोड़ना, निद्रा आदि
का कारण जो खेद उसे श्रम संज्ञक भाव कहते हैं। जैसा कि प्राचीनाचार्यों ने कहा है—
राह में अधिक चलना व्यायाम एवं सेवादि करना इन विभावों के द्वारा एवं
देहमर्दन, मुँह सिकोड़ना, देह मोड़ना, लम्बी साँस, जम्हाई लेना, मन्द-मन्द पैर फेंकना
इन अनुभावों से श्रम को प्रकटित होते हुए माना गया है।
अन्यों ने भी कहा है कि मार्ग गमन आदि से उत्पन्न खेद को श्रम कहते हैं जो
निद्रा, श्वास आदि करनेवाला होता है।
यह श्रमभाव शरीर में बल रहने पर भी होता है, शारीरिक व्यापार से ही
होता है जबकि ग्लानिभाव में ऐसी बात नहीं है। अतः खेदविशेष रूप ऐक्य रहने के
बावजूद ग्लानि से श्रम का भेद है। उदाहरण—