रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० रसगङ्गाधरः
उदाहरणम्—
विधाय सा मद्वदनानुकूलं कपोलमूलं हृदये शयाना ।
चिराय चित्रे लिखितेव तन्वी, न स्पन्दितुं मन्दमपि क्षमासीत् ॥
अत्र विपरीतसुरतरूपः शारीरव्यापारो विभावः । स्पन्दराहित्य-शयना-
दयोऽनुभावाः । न चात्र निद्रा-भावध्वननेन गतार्थतेति शङ्क्यं, सुषुप्तौ हि
ज्ञानराहित्येनैव यत्नराहित्यान्मन्दमपि स्पन्दितुं न क्षमासीदित्यस्यानतिप्रयो-
जनकत्वापत्तेः, शीङाभिहिततया तस्या व्यङ्ग्यत्वानुपपत्तेश्च । श्रमे त्वानुगुण्य-
मुचितम् ।
रूपधनविद्यादिप्रयुक्तात्मोत्कर्षज्ञानाधीनपरावहेलनं गर्वः ।
उदाहरति—विधायेति । सा तन्वी कोमलाङ्गी, कपोलमूलं मद्वदनानुकूलं विधाय
हृदये नायकस्योरसि शयाना सती, चिराय चिरकालं यावत् चित्रे लिखिता इव, मन्दं
स्वल्पमपि स्पन्दितुं शरीरसंचारं कर्त्तुं क्षमा समर्था नासीत् ।
न चात्रेति । अत्र श्रमोदाहरणपद्ये निर्व्यापारत्वादिन व्यज्यमाना निद्रैवेति
तयैव श्रमभावो गतार्थ इति नाशङ्कनीयम् । अत्र हेतुद्वयम्—सुषुप्तौ निद्रायां, ज्ञानाभावे-
नैव चेष्टाशून्यत्वं स्वतः सिद्धं, तदर्थं च स्पन्दराहित्यवर्णनं व्यर्थं स्यादित्येको हेतुः,
अपरश्च "शयाना" इतिपदेन वाच्यतयैव निद्रोपस्थिता कथं व्यङ्ग्यतां यास्यतीति ।
श्रमभावे तु निद्राह्युपकारकमेव ।
गर्वं निरूपयति—रूपेति । रूपधनादिकारणैः स्वस्मिन् उत्कर्षज्ञानेन जायमानं
परेषां अवज्ञा तिरस्कारः चित्तवृत्तिविशेषो गर्वाख्यो भावः । आत्मोत्कर्षप्रतिपादनं
गर्वस्य विभावः, परावहेलनजनको वाक्यप्रयोगोऽनुभावः ।
'वह कोमलाङ्गी अपने गाल के मूल को मेरे मुख के अनुकूल करके मेरे
( नायक के ) हृदय पर सोयी हुई देर तक तस्वीर में लिखित होने के समान थोड़ा
भी शारीरिक संचार करने में अक्षम थी ।
यहाँ विपरीत सुरत रूप शारीरिक व्यापार श्रम का विभाव है और हिलने में
असमर्थता, शयन आदि अनुभाव हैं। यहाँ निद्रा भाव के ध्वनित होने से ही श्रम को
गतार्थ नहीं माना जा सकता, क्योंकि निद्रित अवस्था में ज्ञानरहित होने से ही यत्न-
रहितत्व सिद्ध ही है, फिर "थोड़ा भो हिलने में सक्षम नहीं थी" इस कथन का
निष्प्रयोजन होने की आपत्ति आती है और शीङ् धातु के रूप "शयाना" के द्वारा
वाच्यरूप से उपस्थित निद्रा को व्यङ्ग्य कहना अनुपपन्न है। श्रमभाव में तो ऐसा
कथन अनुकूल ही है ।
रूप, धन, विद्या आदि के कारण अपने उत्कर्ष ज्ञान के अधीन अन्य व्यक्ति
का तिरस्कार ही गर्व भाव है ।