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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 414 में से

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पृष्ठ 329

प्रथमाननम् २९७
तत्रोत्तमे पुरुषे स्वापोऽनुभावः। मध्यमे हसित-गाने। नीचे तु रोदन-
परुषोक्त्यादि। अयं च मदस्त्रिविधः—तरुण-मध्यमाधमभेदात्। अव्यक्तासंगत-
वाक्यैः सुकुमारस्खलद्गत्या च योऽभनीयते स आद्यः। भुजाक्षेप-स्खलित-घूर्ण-
तादिभिर्मध्यमः। गतिभङ्ग-स्मृतिनाश-हिक्काच्छर्द्यादिभिरधमः। उदाहरणम्—
मधुरतरं स्मयमानः, स्वस्मिन्नेवाऽलपञ्शनैः किमपि।
कोकनदयँस्त्रिलोकीमालम्बन-शून्यमीक्षते क्षीवः॥
उत्तममत्त्वः प्रहसति, गायति तद्वच्च मध्यमप्रकृतिः।
परुषवचनाभिधायी, शेते रोदित्यधमसत्त्वः॥
उत्तमे प्रहासोऽट्टहासः, अधिके मदे सति स्वापः, मध्यमे उत्तमवद् अतिहासो
गानं च, अधमे परुषवचनं, रोदनम् अपहसितं च, अधिके मदे तु सर्वत्र स्वाप एवेति
तत्त्वम्।
अव्यक्तेति। अव्यक्तमस्फुटाक्षरम्, असंगतमसम्बद्धम्। सुकुमारा अनुद्धता,
स्खलन्ती वारं वारं त्रुट्यन्ती चासौ गतिस्तया। हिक्का 'हिचकी' इति हिन्दीभाषा-
प्रसिद्धा, पित्तोल्बणवशात्कण्ठगतविकृतवायुध्वनिः। छर्दिः वमनम्।
मधुरतरमिति। कश्चित् क्षीवो मत्तः, मन्दं मन्दं स्मितं कुर्वन्, स्वस्मिन्
आत्मनि अन्यं विनैव, किमपि असम्बद्धं, शनैरस्पष्टम् आलपन् वार्तालापं कुर्वन्, त्रिलोकीं
त्रिभुवनमेव मदारुणदृष्ट्या कोकनदयन् रक्तकमलमिव कुर्वन्, आलम्बनशून्यं निरालम्बं
निर्विषयं शून्यमेवेति यावत्, पश्यति।
उत्तम व्यक्ति मद्यपान के बाद सो जाता है और यही शयन मदभाव का
अनुभाव है। मध्यम व्यक्ति में हँसना और गाना अनुभाव होता है, जब कि अधम
व्यक्ति (नीच) में रोदन और कठोर वचन आदि अनुभाव अनुभूत हैं। यह मद तीन
प्रकार का है—तरुण, मध्यम एवं अधम। अव्यक्त एवं असंगत वाक्यों के द्वारा कोमल
एवं लड़खड़ाती हुई गति के द्वारा जो अभिनीत हो, वह तरुण मद कहलाता है।
बाँहों को फड़काना, स्खलित एवं चकराती गतियों से मध्यम मद व्यक्त होता है। चलने
में रुकावट, स्मृतिनाश, हिचकी एवं वमन आदि से अधम मद प्रकटित होता है।
यथा—
मत्त व्यक्ति मधुर-मधुर मुस्काता हुआ, आप-ही-आप धीरे-धीरे कुछ-कुछ
(असम्बद्ध) बोलता हुआ, तीनों लोकों को लाल कमल के समान (मदजन्य आँख
एवं मन की रक्तिमा से) रक्त वर्ण करता हुआ, विषय के बिना ही शून्य को देख
रहा है।