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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 414 में से

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पृष्ठ 327

प्रथमाननम् २९५
यदाहुः—
विभावा यत्र दारिद्र्यमैश्वर्यभ्रंशनं तथा ।
इष्टार्थापहृतिः शश्वच्छ्वासोच्छ्वासावधोमुखम् ॥
सन्तापः स्मरणं चैव कार्श्यं देहानुपस्कृतिः ।
अधृतिश्चानुभावाः स्युः सा चिन्ता परिकीर्तिता ॥
वितर्कोऽस्याः क्षणे पूर्वे पाश्चात्येवोपजायते ॥ इति ॥
ध्यानं चिन्ता हितानाप्तेः सन्तापादिकरी मता ॥ इति च ।
उदाहरणम्—
अधरद्युतिरस्त-पल्लवा, मुखशोभा शशिकान्त-लङ्घिनी ।
अकृतप्रतिमा तनुः कृता, विधिना कस्य कृते मृगीदृशः ॥
लक्षणस्यास्य प्राचीनाचार्यसम्मतत्वं दर्शयति—यदाहुरिति । सा चिन्ता, यत्र दारि-
द्र्यादयो विभावाः, इष्टार्थापहृत्यादयोऽनुभावा इति सारांशः । दरिद्रता जन्मजाता
पश्चाद्द्भवा वा धनाभावजन्या, प्रभुत्वस्य प्रभावस्य नाश ऐश्वर्यभ्रंशनं, शश्वत् सदैव,
स्मरणमर्थादिनाशस्य, कार्श्यं देहस्य क्षीणता, अनुपस्कृतिरसंस्कारः, अधृतिर्धैर्याभावः ।
अस्याः पूर्वक्षणे पश्चात्क्षणे वा वितर्को जायते । हिताप्राप्तिजन्यं यद्ध्यानं तदेव चिन्ता ।
चिन्ताख्यं भावमुदाहरति-अधरेति । विधिना विधात्रा, मृगीदृशो मृगनयनाया
रमण्या एनाः कस्य पुण्यातिशयवतो भाग्यवतो यूनः कृते कृता निर्मिताः ? अस्तो दूरे
निक्षिप्तः पल्लवो यया जितपल्लवेत्यर्थः तथाविधा अधरकान्तिः, चन्द्रशोभातिक्रमण-
कारिणी मुखशोभा, न कृता प्रतिमा प्रतिकृतिर्यस्यास्तादृशी अनुपमाना तनुश्चेति ।
व्यतिरेकाऽलङ्कारः ।
जैसे कि आचार्यों ने कहा है—
जहाँ जन्मसिद्ध दरिद्रता, ऐश्वर्य (प्रभुत्व या सम्पत्ति) से च्युत होना एवं इष्ट
वस्तु का अपहरण हो जाना चिन्ता के कारण होने से विभाव हों और सतत श्वास का
तेजी से ऊपर नीचा होना, नीचे मुख करना, सन्ताप, नष्ट वस्तु का स्मरण, दुबले
होना, देह को परिष्कृत न करना, अधीरता इत्यादि कार्यरूप अनुभाव हों, उस चित्त-
वृत्ति को चिन्ता कहा गया है। इस चिन्ता के पूर्वक्षण में या बाद के क्षण में वितर्क
(सन्देहादि के बाद आने वाला स्फूर्तियुक्त विचार) उत्पन्न होता है। और भी कहा
है कि हित वस्तु की अप्राप्ति से उत्पन्न उस विचार को चिन्ता कहते हैं जिससे सन्ताप
आदि उत्पन्न होते हों। उदाहरण—
विधाता ने इस मृगनयना के शरीर की रचना किसके लिए की, जिसे नायिका
के अधर की कान्ति पल्लव की शोभा को दूर फेंक दी, मुखशोभा चन्द्रमा की कान्ति से
बढ़कर है और शरीर तो अनुपम ही है।