रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २९३
चित्तौत्सुक्यान्मनस्तापाद् दौर्गत्याच्च विभावतः ।
अनुभावात्तु शिरसोऽभ्यावृत्तेर्गात्रगौरवात् ॥
देहोपस्करत्यागाद् दैन्यं भावं विभावयेत् ॥ इति ।
दौर्गत्यादेरनौजस्यं दैन्यं मलिनतादिकृत् ॥ इति च ।
अत्र हतकेन मया विवासिता, न तु विधिनेत्येतस्यार्थस्य पतितोपमयैव
परिपोषः, न तु शूद्राद्युपमया । यतः शूद्रस्य जात्यैव श्रुतिदौर्लभ्यं विधिना
कृतम्, पतितस्य तु ब्राह्मणादेर्विधिना श्रुतिसुलभत्वे स्वभावेन कृतेऽपि तेनैव
तथाविधं पापमाचरता स्वतः श्रुतिर्दूरीकृतेति तस्य पतितेन साम्यम् । तस्याश्च
श्रुत्येत्युपमालङ्कारो दैन्यमेवालङ्कुरुते ।
चित्तौत्सुक्येति । चित्तस्य औत्सुक्यं, मनोव्यथा, दौर्गत्यं दरिद्रता चेति
दैन्यभावस्य विभावाः, शिरसोऽभ्यावृत्तिः पुनःपुनर्धूननं, देहशैथिल्यं, देहप्रसाधनत्यागश्चेति
अनुभावाः तैभ्यो दैन्यं भावं विभावयेद् जानीयात् । दौर्गत्यादेर्दारिद्र्यादिकारणाद् यद्
अनौजस्यम् ओजोहीनता, सैव दैन्यं यद् मुखमालिन्यादि करोतीति ।
अत्रेति । पूर्वोक्तोदाहरणे मयेत्यनेन मयैव न तु विधिनेति व्यज्यते । तदर्थस्य
पतितसादृश्येनैव परिपुष्टिर्भवति, न तु शूद्रसादृश्यकथनेन 'वृषलस्येव' इत्यनुमितपाठ-
कल्पनेन । जात्यैव शूद्रत्वेनैव "न स्त्रीशूद्रौ वेदमधीयाताम्" इत्यागमबोधितेनैव वेद-
शून्यत्वं शूद्रस्य जन्मनैव विधिना विहितम् । पतितो द्विजातिस्तु विधिना स्वभावेन,
स्वजात्यैव श्रुतिप्राप्त्यधिकारीकृतः, परन्तु स पतितः स्वकीय-पापाचरणेनैव स्वतः श्रुतिं
दूरीकृत्य तादृशपावनवस्तुतो विहीनो भवतीति । तथैव रामोऽपि सीतायाः पतित्वेन
स्वतः सुलभां तां स्वीयाविवेकाद् दूरीकृत्य तदनधिकारी संवृत्त इति रामे पतितद्विजाति-
समान' इस प्रकार का अपने विषय में हीनता के प्रतिपादक वचन अनुभाव हैं। इन्हीं-
से दैन्य संज्ञक भाव अभिव्यक्त हो रहा है । ऐसा ही प्राचीनाचार्यों ने कहा है—
मन की उत्सुकता, मनस्ताप और दरिद्रता इन विभावों से तथा सर को बार
बार हिलाने, देह का भारीपन और शरीर के प्रसाधन का त्याग, इन अनुभावों से दैन्य
भाव को जाने । और यह भी कहते हैं कि दरिद्रता आदि के कारण जो दुर्बलता (ओज-
स्विता का अभाव ) हो जाती है, वही दैन्य भाव है जो मुखमलिनतादि का कारण है ।
यहाँ 'अभागा मैंने सीता को निर्वासित कर दिया, न कि विधाता ने' इस अर्थ
की परिपुष्टि पतितसादृश्य से ही होती है, न कि शूद्रादि के सादृश्य से । क्योंकि शूद्र के
लिए जन्म से ही या जाति से ही वेद को दुर्लभ कर दिया विधातां ने, पर पतित
ब्राह्मणादि के लिए विधाता ने स्वाभाविक रूप से वेद को यद्यपि सुलभ कर दिया है,
तथापि उसी पतित ने उस प्रकार के पाप करके स्वतः वेद को दूर कर दिया । अतः