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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 414 में से

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पृष्ठ 320

२८८ रसगङ्गाधरः
शुण्डादण्डं कुण्डलीकृत्य कूले कल्लोलिन्याः किंचिदाकुञ्चिताक्षः ।
नैवाकर्षत्यम्बु नैवाम्बुजालिं कान्तापेतः कृत्यशून्यो गजेन्द्र ॥
लोभ शोक · भयादिजनितोपप्लवनिर्वारणकारणीभूतश्चित्तवृत्तिविशेषो
धृति ॥
उदाहरणम्--
संतापयामि हृदयं धावं धावं धरातले किमहम् ।
अस्ति मम शिरसि सततं नन्दकुमारः प्रभुः परमः ।।
अत्र विवेकश्रुतसंपत्त्यादिर्विभावः । चापलाद्युपशमोऽनुभावः । ननु चोत्त-
रार्धे चिन्ता नास्तीति वस्तुनोऽभिव्यक्तेः कथमस्य धृतिभावध्वनित्वमिति
शुण्डादण्डमित्यादि । कान्तापेत इत्यनेन विभावः प्रदर्शितः । अनुभावा-
श्चाक्षेपगम्याः ।
धृतिलक्षणम्--लोभेत्यादि । जनिपर्यन्तमुपप्लवविशेषणम् ।
संतापयामीत्याद्युदाहरणं धृतेः । धावं धावमित्याभीक्ष्ण्ये णमुल्, धावित्वा
धावित्वेत्यर्थः । अर्थः स्पष्टः । उत्तरार्धे कारणवर्णनम् ।
विवेकम्पत्तिः श्रुतं शास्त्रीयं ज्ञानं तस्य च सम्पत्तिः विवेकश्रुतसम्पत्तिः ।
वस्तुनः--चिन्ताभावस्य । अभावस्य तुच्छस्यापि रसालङ्कारभिन्नत्वाद् वस्तुत्व-
"गजराज अपनी प्रियतमा हथिनी के वियोग से इतना किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो चुका
है कि अपनी सूँड को कुण्डलाकार बना और आँखों को सिकोड़कर वह नदी-तट पर
खड़ा होकर भी न तो पानी पी रहा और न ही कमलों को ही अस्त-व्यस्त कर
रहा है ॥"
यहाँ भी प्रिया-वियोग विभाव हैं और नदी-तट पर खड़ा होकर पानी न पीना
आदि अनुभाव जिन सबसे गजेन्द्रगत मोह की अभिव्यञ्जना होती ॥
लोभ, शोक और भय आदि से उत्पन्न होने वाली अशान्ति को उत्पन्न होने से
रोकने वाली चित्तवृत्ति धृति है ॥
इसका उदाहरण देखिए--
"इस धरातल पर इधर-उधर भाग-दौड़कर अपने हृदय को मैं क्यों सन्तप्त करूं
जब परमेश्वर नन्दकुमार-भगवान् श्रीकृष्ण मेरे सर पर हाथ रखे हुए हैं !!"
यहाँ ( आक्षेपगम्य ) विवेकज्ञान, शास्त्राध्ययन-मनन आदि विभाव हैं और
चित्तचाञ्चल्य आदि का अभाव अनुभाव । इन सबसे धृति अभिव्यक्त होती ।
अब प्रश्न यह है कि जब उत्तरार्ध से 'फिर मुझे कैसी चिन्ता' इस प्रकार
निश्चिन्ततास्वरूप वस्तु की व्यञ्जना होती तब इसमें धृति को व्यङ्ग्य भाव कैसे