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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 319

प्रथमाननम् २८७
कतृकं कपोतस्याग्रे कपोत्याः समर्पणं विभावः । वदननमनमनुभावः ।
भयवियोगादिप्रयोज्या वस्तुतत्त्वानवधारिणी चित्तवृत्तिर्मोहः ।
‘अवस्थान्तरशवलिता सा तथा’ इति तु नव्याः ।
उदाहरणम्—
विरहण विकलहृदया विलपन्ती दयित दयितेति ।
आगतमपि तं सविधे परिचयहीनेव वीक्षते बाला ॥
अत्र कान्तवियोगो विभावः । इन्द्रियवैकल्यं लज्जाद्यभावश्चानुभावः ।
यथा वा—
त्रासहर्षयोरनुभावयोरवर्णनादिदमुक्तमिति रसचन्द्रिका । अप्राधान्येनेति युक्ततरं
प्रतीमः । आद्ये चकितेत्यनेनानुभावस्य वर्णनेऽपि विभावस्यावर्णनात्, अन्त्ये
चोभयोर्वर्णनेऽपि नभवाम्बभूवेतिप्रधानीभूतायां क्रियाया हर्षस्य न्यग्भावापादनादिति
बोध्यम् ।
मोहलक्षणमाह--भयेत्यादिना । अवस्थान्तर=उन्मादः, सा = प्रोक्ता चित्तवृत्तिः ।
विरहेणेत्यादि । विकलहृदयेति सापेक्षत्वेऽपि चैत्रस्य गुरुकुलमितिवत्समासः ।
तम् = प्रियम् ।
के लिए अनुकूल ही पड़ती उसी प्रकार द्वितीय उदाहरण में व्यज्यमान हर्ष की थोड़ी-
सी मात्रा भी प्रधानीभूत व्रीडा के अनुकूल ही है । यहाँ द्वितीय उदाहरण में कबूतर
के सामने प्रियतम द्वारा कबूतरी का समर्पण विभाव है और वदन का झुकाना अनु-
भाव । इन सबसे व्रीडा-स्वरूप भाव की व्यञ्जना होती ॥
भय और इष्टजन-वियोग आदि से उत्पन्न होने वाली और वस्तु के यथार्थस्वरूप
का निर्णय न करने वाली चित्तवृत्ति को मोह कहा जाता ।
किन्तु कुछ नवीन आचार्य उत्कटतावस्था को प्राप्त उन्मत्तता नामक चित्तवृत्ति
को ही मोह कहते ।
इसका उदाहरण यह है--
“विरह से विकल हृदय वाली मुग्धा नायिका बार-बार 'प्रियतम ! प्रियतम !'
यह विलाप कर रही थी । इसलिए पास आ जाने पर मुझे इस तरह देख रही थी
मानो वह मुझे पहचानती ही न हो ॥”
यहाँ प्रियतम का उत्कट वियोग विभाव है और इन्द्रय की विकलता ( अपने
विषय के अवधारण के सामर्थ्य का अभाव ) एवम् निर्लज्जता आदि अनुभाव हैं जिनसे
मोह व्यञ्जित होता ॥
दूसरा उदाहरण भी देखिये—