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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

प्रथमाननम् २६३
प्रौढिं भजन्तु कुमुदानि मुदामुदारा-
मुल्लासयन्तु परितो हरितो मुखानि ।
इत्थमेते प्रसङ्गतो मधुररसाभिव्यञ्जिकायां रचनायां संक्षेपेण निरूपिता
दोषाः ॥
एभिर्विशेषविषयैः सामान्यैरपि च दूषणै रहिता ।
माधुर्यभारभङ्गुरसुन्दरपदवर्णविन्यासा ।।
व्युत्पत्तिमदुद्गिरन्ती निर्मातुर्या प्रसादयुता ।
तां विबुधा वैदर्भीं वदन्ति वृत्तिं गृहीतपरिपाकाम् ॥
सुधाधवलस्य प्रासादस्य शिखरं शीलय । एतेन मुखचन्द्रोदयः सूच्यते । तेन च
कुमुदानि मुदां हर्षाणामुदारां प्रौढि परमां काष्ठां भजन्तु, हरितो दिशश्च अन्धका-
रावगुण्ठनं निरस्य स्वमुखानि उल्लासयन्त्विति पद्यार्थः ।
अत्र वृत्त्यनुप्रासः, 'मुदामुदा' इत्यत्र चांशे यमकमित्येतत्सर्वं शृङ्गाराभिव्यञ्जक-
योजनानान्तरीयकतया योजितं रसप्रतीत्यतिरिक्तप्रतीत्यविषयत्वान्न प्रतिकूल-
मित्याशयः ।
उपसंहरति—इत्थमित्यादि ॥
अन्ते माधुर्यव्यञ्जकरचनायां वैदर्भीरीतेरुचितत्वात् प्रसङ्गतः तां वर्णयति—
एभिरित्यादिकेन पद्यद्वयेन । विशेषविषयाः समान्यविषया दोषाश्च पूर्वोक्ता एव ।
राती हुई चमकती अटारी पर चली जा जिससे तेरे मुख-चन्द्र की चन्द्रिका से ये
कुमुदिनी प्रफुल्लित हो उठे ओर सारी दिशाएं चमक उठें ।।”
इस पद्य में ककार आदि का वृत्त्यनुप्रास और 'मुदामुदा••••'शब्द में यमक का
स्वाभाविक रूप में विन्यास होने से ये अनुप्रासादि सम्भोग-शृंगार की चर्वणा के
अनुकूल हैं, अतः ये त्याज्य नहीं हैं ।
इस प्रकार प्रसङ्ग आ जाने के कारण मधुर-रसों के अभिव्यञ्जक काव्य में
जो दोष हो सकते हैं उनका, संक्षेप में, निरूपण किया गया है ॥
इसी प्रसङ्ग में वैदर्भी रीति ( =उपनागरिका ) का स्वरूप भी स्पष्ट
कर दिया जा रहा है—
“पूर्वोक्त सामान्य ओर विशेष दोषों से रहित, माधुर्य गुण के भार से लदे हुए
सुन्दर पदों ओर वर्णों से संग्रथित, रचनाकार की व्युत्पत्ति—निपुणता को प्रकट
करने वाली, प्रसादगुण-समन्वित ओर रस-परिपाक कराने में समर्थ वृत्ति ( रीति )
को विद्वज्जन 'वैदर्भी' कहते ॥”