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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 291

प्रथमाननम् २५९
संयोगनिषेधो निरवकाश इति चेत् ? न, सकृत्प्रयोगविषयत्वेनास्य पार्थक्यात् ।
अन्यथा मनाक्कुरुष इति निर्दोषं स्यात् ।
महाप्राणघटितसंयोगो यथा—
अयि मृगमदबिन्दुं चेद्भाले बाले समातनुषे ।
जश्त्वाद् गकाररूपेणैवोपलब्धिर्न तु ककाररूपेण, यस्तु गकारद्वयसंयोगस्तस्य
हलां स्वात्मना संयोगनिषेधोक्तरेव संग्रहादिदमुक्तम् । सकृदित्यादि । अत्र
महाप्राणघटितसंयोगातिरिक्तस्य सवर्णझ्य्द्वयसंयोगस्य सकृत्प्रयोगो निषेधस्य विषय-
त्वेन विवक्षित इति बोध्यम् । अत एवाग्रिमपद्यव्याख्याने 'अधुनैव महाप्राणसंयोग-
स्याऽसकृत्प्रयोगे निषेधविषयतां व्यवस्थाप्य तत्सकृत्प्रयोगे पुनरेतदुदाहरणप्रदर्शनं कथं
संगच्छत इति चिन्त्यम्' इति चन्द्रिकोक्तिश्चिन्त्या, पूर्वमप्यस्य सकृत्प्रयोगस्यैव
निषेधात् । अस्य = प्रकृतनिषेधस्य । अन्यथेति । यदि निषेधान्तरविषयत्वमस्य
सवर्णझ्य्द्वयनिषेधस्योच्येत तर्हीत्यर्थः । निर्दोषं स्यादिति । प्रकृतस्य संयोगस्य
निषेधान्तरविषयत्वे स्वीकृते महाप्राणघटितातिरिक्तसवर्णझ्य्द्वयसंयोगोऽपि असकृदेव
प्रयुक्तो निषिद्धः स्यात्, न तु सकृदपि, पूर्वं तस्य तस्य निषेधस्याऽसकृत्प्रयोगविषय-
त्वोक्तेः; तथा च सकृत्संयोगे 'क्कु' इत्यत्रोदाहृतपद्यस्थे प्रतिकूलतयाऽभिमतेऽपि निषेध-
विषयत्वं न स्यादिति तात्पर्यम् ।
अयीत्यादि । अयि बाले ! यदि त्वं स्वभाले मृगमदस्य कस्तूरिकाया विन्दुं
समातनुषे तर्हि राकारमणस्य साम्राज्यमधुनैव शमितं कलयेति पूर्वपद्योत्तराद्धेनेदं
तभी प्रतीत होगी यदि इनका अनेक बार प्रयोग किया गया हो, एक बार प्रयोग
करने पर नहीं। किन्तु ऐसा संयोग एक बार प्रयुक्त होने पर भी मधुर रस के लिए
प्रतिकूल है। अतः ऐसे संयोगों का एक बार भी प्रयोग करना अनुचित है—इस
विषय को सिद्ध करने के लिए सवर्ण-झय् द्वय-संयोग का स्वतन्त्र रूप में निषेध
किया जाना सर्वथा आवश्यक है। अन्यथा उदाहृत पद्य में 'मनाक्कुरुषे' इस अंश में
सवर्ण-झय्-द्वय का एक संयोग कथमपि दुष्ट नहीं होता, जबकि वस्तुतः यह रसप्रति-
कूल होने से दुष्ट है हीं। अतः यह स्वतन्त्र निषेध सार्थक है।
महाप्राणघटित संयोग का एक बार प्रयोग 'अयि मृगमद....' आदि पद्य के
'द्भाले' अंश मे है। इस पद्य का उत्तरार्द्ध पूर्वोदाहृत पद्य का उत्तरार्द्ध—"अधुनैव
कलय...साम्राज्यम्' हीं है ! इस प्रकार पद्य का अर्थ यह हुआ —
"अरी बाले ! अगर तूं अपने माथे पर कस्तुरी की बिन्दी लगा ले तब तो
सच मान पूर्णचन्द्र का सौन्दर्य पर जो आधिपत्य है वह समाप्त हो चुका ॥"
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