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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 414 में से

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पृष्ठ 290

२५८ रसगङ्गाधरः

नन्वत्र ककारद्वयसंयोगस्य हल्घटितस्वात्मसंयोगत्वेनैव निषेधात्कखसंयो-
गस्य महाप्राणसंयोगनिषेधविषयत्वात्तृतीयसंयोगस्य चासंभवात्सवर्णेझयद्वय-
मधुरं कुरुषे तर्हि राकारमणस्य पूर्णचन्द्रस्य सौन्दर्यसाम्राज्यमधुनेव सद्य एव शमितं
कलय जानीहि। अत्रैकस्यैव 'क्कु' ऽति सवर्णझयद्वयघटितसंयोगस्य प्रयोगात्
प्रतिकूलत।
सवर्णझयद्वयघटितसंयोगस्य वर्जनीयत्वेन पृथगुपादानं निरर्थकमिति शङ्कते—
नन्वित्यादिना। स्वात्मेत्यादि 'हलां ल-म-न-भिन्नानां स्वात्मना संयोगस्य••••'
इत्यनेन पूर्वमिदमुक्तम्। असम्भवादिति। गकारे परे पूर्वस्य ककारस्य नियमेन
यही उदाहृत पद्य का अर्थ है। इसमें 'मनाकुरुषे' इस अंश में क्+क् का
संयोग सवर्णझय् संयोग है। यह शृङ्गार रस के प्रतिकूल है।
इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठाया गया है—
पहले ल्, म् और न् से भिन्न व्यञ्जनों के समान व्यञ्जन के साथ संयोग
का मधुर-रसाभिव्यञ्जक रचना में निषेध किया जा चुका है। अतः टवर्गातिरिक्त
व्यञ्जनवर्गों के प्रथम+प्रथम के संयोग (जैसे दो-दो ककार आदि के संयोग) का तो
उक्त निषेध में ही समावेश स्पष्ट है। जहाँ तक चार व्यञ्जनवर्गों के प्रथम तथा
द्वितीय व्यञ्जनों (क्+ख् आदि) के संयोग के निषेध की बात है वह भी व्यञ्जनवर्गीय
द्वितीय वर्णों के महाप्राण होने से महाप्राणघटित संयोग के पूर्वोक्त निषेध में गतार्थ
है। यही स्थिति सवर्ण तृतीय-चतुर्थ व्यञ्जनों के संयोग (ग्+घ्) की भी है।
वर्गों के प्रथम-तृतीय का संयोग तो असम्भव है, क्योंकि तृतीय व्यञ्जन के परे
पूर्ववर्ती प्रथम व्यञ्जन का नियमतः जश् (उसी वर्ग के तृतीय व्यञ्जन) के रूप में
परिवर्तन हो जाने से वह सवर्ण प्रथम-तृतीय व्यञ्जनों (ग्+ग्) में ही होगा। इसका
निषेध भी एक व्यञ्जन का स्वसमानरूप दूसरे व्यञ्जन (क्+क्) के संयोग के
पूर्वोक्त निषेध से ही हो जाता है। न् और म् को छोड़ कर अन्य व्यञ्जनवर्गीय
पञ्चम व्यञ्जनों का सवर्ण पञ्चम व्यञ्जनों के साथ (ङ्+ङ् आदि) जो संयोग
होगा उसका भी इसीसे निषेध स्पष्ट है। ऐसी स्थिति में कौन-सा दो सवर्ण झयो
का संयोग बचा रह जाता जिसके निषेधके लिए सवर्णझय्-द्वय-संयोग का स्वतन्त्र
रूप में यह निषेध सार्थक है?
इसके उत्तर में यह कहा गया है—स्वसमानरूप व्यञ्जनों के संयोग का एक से
अधिक बार प्रयोग होने पर हीं पूर्वोक्त निषेध किया गया है, एक बार प्रयोग होने
पर नहीं। अतः यदि प्रथम-प्रथम, तृतीय-तृतीय और पञ्चम-पञ्चम व्यञ्जनों के
संयोगों को भी पूर्वोक्त निषेधके हीं विषय मानेंगे तो इनमें भी मधुररस-प्रतिकूलता