रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २५७
झय्द्वयघटितसंयोगस्य यथा—
आ सायं सलिलभरे सवितारमुपास्य सादरं तपसा ।
अधुनाब्जेन मनाक् तव मानिनि तुलना मुखस्याप्ता ॥
अत्र द्वितीयार्धमरम्यम् । 'सरसिजकुलेन संप्रति भामिनि ते मुखतुला-
धि्रगता' इति तु साधु ।
सवर्णझय्द्वयघटितसंयोगस्य सकृत्प्रयोगे यथा—
अयि मन्दस्मितमधुरं वदन तन्वङ्गि यदि मनाक्कुरुषे ।
अधुनैव कलय शमितं राकारमणस्य हन्त साम्राज्यम् ॥
झय्द्वयेति । असवर्णझय्द्वयेत्यर्थः ।
आ सायमिति । मानापनोदनाय कश्चिन्मानिनीं स्तौति । ह्यः प्रातरारभ्य
सायंकालपर्यन्तं सलिले स्थित्वा सवितारं सादरमुपास्याब्जं यत्तपस्तेपे तेन निमित्त-
भूतेन, हे मानिनि ! अधुना अद्य तव मुखस्य मानात्पूर्वं विकसितस्य तेनाब्जेन
मनागीषत् तुलना प्राप्ता ।
अत्राब्जशब्दे आप्तशब्दे च बकार-जकारयोः पकार-तकारयोश्च झयोः संयोगद्वय-
मित्यननुकूलमिदमित्याह—अरम्यमिति । अत्रानुकूलं विन्यासं प्रदर्शयति—सरसि-
जेत्यादिना ।
अयि मन्देत्यादि । अयि तन्वङ्गि ! यदि त्वं स्ववदनं मनागपि मन्दस्मितेन
झय्-प्रत्याहार के असवर्ण व्यञ्जनों के संयोग का प्राचुर्य “आ सायं सलिलभरे
···” इत्यादि पद्य में उपलब्ध है । पद्यार्थ निम्नलिखित है—
“ओ मानिनी ! कल प्रातः काल से लेकर सायंकाल तक जल के भीतर रहकर
सूर्य की श्रद्धापूर्वक उपासना करने वाली कमलिनी अपने तप के फलस्वरूप आज
तेरे मुख की थोड़ी-सी समानता पा सकी है ॥”
इस पद्य के उत्तरार्द्ध में 'अब्ज' शब्द में ब् + ज् का और 'आप्ता' शब्द में
प्-+त् का संयोग झय्-द्वयसंयोग है । यह शृङ्गार रस के प्रतिकूल है । हाँ, यदि
'सरसिजकुलेन सम्प्रति भामिनि ते मुखतुलाधिगता' यह पाठ उत्तरार्द्ध का होता
तो उक्त दोष नहीं होता ।
दो सवर्ण झयों का एक बार संयोग 'अयि मन्दस्मित···' आदि पद्य में प्राप्त
होता ।
“ओ कोमलाङ्गी ! यदि तूं अपने मुह को थोड़ी सी मुस्कुराहट से आकर्षक
बना ले तो सच मान कि पूर्ण चन्द्र का सौन्दर्य पर जो आधिपत्य है वह समाप्त
हो चुका ॥”