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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

२५४ रसगङ्गाधरः
अलका ≍ फणिशावतुल्यशीला नयनान्ता ≍ परिपुङ्खितेषुलीलाः ।
चपलोपमिता खलु स्वयं या बत लोके सुखसाधनं कथं सा ॥
अत्र द्वावुपध्मानीयावेव न शान्तानुगुणौ ।
टवर्गझयां प्राचुर्यं यथा-
वचने तव यत्र माधुरी सा हृदि तूर्णा करुणा च कोमलेऽभूत् ।
'अधुना हरिणाक्षि हा कथं वा कटुता तत्र कठोरताविरासीत् ॥
अधुना सखि तत्र हा कथं वा गतिरन्यैव विलोक्यते गुणानाम्' इति
त्वनुगुणम् ।
अलका ≍ फणि ...... इत्यादि । सा स्त्री लोके सुखसाधनं कथं भवेद्
यस्या अलकाः केशपाशाः फणिशावैः सर्पशिशुभिस्तुल्यं शीलं येषां तादृशाः, नयना-
न्ताश्च कटाक्षाः परिपुङ्खिताः पुङ्खयुक्ता ये इषवो बाणास्तेषां लीलेव लीला येषां
तादृशाः, गम्भीराघातजनका इति यावत्, अथ च स्वयं चपलया विद्युतोपमिताऽतीव
चञ्चलस्वभावा वर्त्तत इत्यर्थः ।
अत्रोपध्मानीयद्वयम्, एकः-अलका ≍ इत्यत्र अन्यश्च - नयनान्ता ≍ इत्यत्रेति
प्राचुर्यं स्पष्टमेव । शेषस्तु बन्धो युक्त एवेत्येवकारेण सूच्यते ।
वचन इत्यादि । हे हरिणाक्षि ? तव यत्र वचने सा विलक्षणा माधुरी, यत्र
च तव कोमले हृदि पूर्णा करुणाऽभूत् तत्रैव वचनेऽधुना मानकाले कटुता हृदि च
कठोरता कथं प्रादुर्भूतेत्यर्थः । अत्र टवर्गस्य कटुता-कठोरता-शब्दयोर्द्विःप्रयोगो
नानुकूल इति अनुकूलं पाठान्तरमुत्तरार्धस्य प्रदर्शयति-अधुनेत्यादि । अर्थः
“जिस वनिता के केश-पाश सांप के बच्चों के समान हों, जिसके कटाक्ष पंख
वाले बाणों के समान आघात करने वाले हों और जो स्वयम् बिजली के समान
चञ्चल हो वह वनिता भला इस लोक में सुख का साधन कैसे हो सकती ?”
टवर्ग-झय् के प्राचुर्य का उदाहरण है 'वचने तव यत्र...' आदि पद्य। इसमें 'कटुता'
और 'कठोरता' शब्दों में टवर्ग के साथ-साथ झय्-प्रत्याहारान्तर्गत क-ट और क-ठ
का प्रयोग होने से रचना में शृङ्गारानुकूलता नहीं है। पद्यार्थ निम्नलिखित है।—
“अरी प्रिये ! मुझे आश्चर्य है कि तेरी जिस वाणी में मधुरता और कोमल
हृदय में पूर्ण करुणा थी उन्हीं वाणी और कोमल हृदय में आज क्रमशः ये कटुता
और कठोरता कहाँ से आ गईं ?”
परन्तु इसी पद्य का उत्तरार्द्ध यदि 'अधुना सखि.....' इत्यादि रूप में विन्यस्त
होता तो वह शृङ्गार के प्रतिकूल न होता । इस पाठान्तर का अर्थ है— “किन्तु
आज तेरी वाणी और कोमल हृदय में पहले के गुणों के विपरीत दशा क्यों देखी
जा रही है ?”