रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २५३
कलितकुलिशघाता ≍ केऽपि खेलन्ति वाता ≍
कुशलमिह कथं वा जायतां जीविते मे ।
अयमपि बत गुञ्जन्नालि माकन्दमौलौ
चुलुकयति मदीयां चेतनां चञ्चरीकः ॥
अत्र द्वितीयजिह्वामूलीयपर्यन्तमननुगुणं माधुर्यस्य । यदि च 'कथय
कथमिवाशा जायतां जीविते मे, मलयभुजगवान्ता वान्ति वाताः कृतान्ताः'
इति विधीयते तदा नायं दोषः ।
उपध्मानीयप्राचुर्यं यथा—
कलितेत्यादि । कुलिशस्य वज्रस्य घाता इव घाताः कुलिशघाताः, कलिताः
कुलिशघाता यैस्ते केऽपि विलक्षणा वाता इह खेलन्ति यदा तदा हे आलि मम
जीवितविषये कथं नाम कुशलं जायताम् ! माकन्दमौलौ आम्रशिखरे गुञ्जन्नयं
चञ्चरीको भ्रमरोऽपि मदीयां चेतनां चुलुकयति शोषयति—इति पदार्थः ।
द्वितीयेति । वाता ≍ केपीत्यत्रेत्यर्थः । द्विःप्रयोगेऽपि प्राचुर्यमभिमतमिति
पूर्वमुक्तमेव । मलयेत्यादि । मलयाचलस्था ये वातास्तैर्वान्ता उद्गीर्णा अत एव
कृतान्ताः कृतोऽन्तो विनाशो यैस्ते, यद्वा कृतान्तो यमस्तत्सदृशा ( वाताः ) वान्ति
प्रवहन्ति इत्यर्थः परिष्कृतस्य पाठस्य ।
उपध्मानीय इत्यादि । पफाभ्यां प्रागर्धविसर्गसदृशो विसर्गस्थानिक आदेशः
≍ इति रेखाङ्कित उपध्मानीय उच्यते । तस्य प्राचुर्यमेकाधिकवारं प्रयोगः ।
“वज्र के समान कठोर आघात करने वाली यह कोई भयङ्कर हवा (आन्धी)
बह रही है । ऐसी दशा में मेरे जीवन में कुशल कैसे हो सकता ? देख मेरी
सखी ! आम के बोरों पर गूँजता हुआ यह भौंरा भी मेरी चेतना को पीता सा-जा
रहा है ॥”
उपर्युक्त पद्य में 'घाता ≍' यह प्रथम और 'वाता ≍' यह द्वितीय जिह्वामूलीय
है । यहाँ तक का अंश माधुर्य के लिये प्रतिकूल है । अतः यदि 'कथय कथमि-
वाशा....' इत्यादि रूप में पूर्वार्द्ध का विन्यास कर दिया जाय तो माधुर्य के अनुकूल
होगा । इस पाठान्तर का अर्थ यह है—“बता री सखी ? मुझे अपने जीवन की
आशा कैसे हो सकती जब मलयाचलनिवासी विषधर साँपों के मुँह से निकली हुई
प्राणहरण करने वाली हवा बह रही हो ॥”
विसर्गस्थानिक उपध्मानीय की प्रचुरता का प्रयोग 'अलका ≍ फणि....' आदि
पद्य में हुआ है । इसमें 'अलका ≍'और 'नयनान्ता ≍' इन दो उपध्मानीयों का
प्रयोग शान्त रस के प्रतिकूल है । पदार्थ इस प्रकार है—