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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 414 में से

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पृष्ठ 284

२५२ रसगङ्गाधरः
तु 'दन्तांशुकान्तमरविन्दरमापहारि सान्द्रामृतं' इत्यादि क्रियते तदा सर्वमेव
रमणीयम् ।
विसर्गप्राचुर्यं यथा—
सानुरागास्सानुकम्पाश्चतुराश्शीलशीतलाः ।
हरन्ति हृदयं हन्त कान्तायाः स्वान्तवृत्तयः ॥
अत्र शकारद्वयसंयोगान्तं पूर्वार्धं माधुर्यानिनुगुणम् ।
जिह्वामूलीयप्राचुर्यं यथा—
स्वघटकत्वाद्वा । 'म्बं' इत्यस्य झय्घटितसंयोगत्वेऽपि मधुरमकारघटितत्वेन तत्पूर्वं
ह्रस्वमादाय न प्राचुर्यमिति कथञ्चिद् व्याख्येयम् । मकारस्य परसवर्णनिष्पन्नतत्वेन
तद्घटितसंयोगस्य चानुकूलतया वा समाधेयम् । दन्तांशुकान्तमित्यादि । दन्ता-
नामंशुभिः प्रकाशैः कान्तं मनोहरमथ चारविन्दस्य रमायाः श्रियोऽपहारि—
इत्यादिरर्थः । चन्द्रबिम्बेऽपि कमलकान्त्यपहारकत्वं प्रसिद्धमेव ।
सानुरागा इत्यादि । कान्तायाः सानुरागाः सानुकम्पाः चतुरा विदग्धा अथ च
शीलेन रसिकस्वभावेन शीतला अनुकूलाः स्वान्तवृत्तयो मनोवृत्तयः कस्य हृदयं न
हरन्ति ? हरन्त्येव सर्वेषां हृदयमित्यर्थः । हन्तेति हर्षे ।
पूर्वार्धमित्यादि । अत्र विशेषः पूर्वमुक्तः ।
संयोग से पूर्व 'उ' यह एक हीं ह्रस्व स्वर है । अतः इस तरह के संयोगों से
पूर्ववर्त्ती ह्रस्व स्वरों की प्रचुरता नहीं कही जा सकती । यद्यपि 'न्दु' और 'म्बं' इन
शब्दों में भी झय् घटित संयोग तो हैं हीं तथापि 'न्दु' शब्द से पहले ह्रस्व स्वर न
होने से कोई दोष नहीं है । साथ हीं, 'न्दु' यह संयोग परसवर्णघटित भी है । इसी
प्रकार, 'म्बं' यह संयोग भी परसवर्णघटित है । अतः इसमें भी स्व-पूर्ववर्त्ती
ह्रस्व स्वर को दूषित करने का सामर्थ्य नहीं है । यदि उक्त पद्य का पूर्वार्द्ध 'दन्तां
:शुकान्तम••••' इत्यादि रूप में संग्रथित हुआ होता तो कोई दोष नहीं रह जाता ।
विसर्गस्थानिक सकार-शकार के प्राचुर्य का उदाहरण 'सानुरागास्सानु••••'
आदि पद्य है । इसमें 'श्शी' शब्द तक पूर्वार्द्ध मधुर रस के प्रतिकूल है, क्योंकि
इसमें 'गा-पा-रा' के बाद विसर्गस्थानिक 'स्-श्-श्' का प्रयोग हुआ हैं । पद्यार्थ
यह है—
"कामिनी की अनुरागपूर्ण, अनुकम्पायुक्त, आकर्षणनिपुण और शील से शीतल
चित्तवृत्तियां बरवश हीं रसिकों के अन्तःकरण को आकृष्ट कर लेतीं ॥"
विसर्गस्थानिक जिह्वामूलीय की प्रचुरता 'कलितकुलिश ••••' आदि पद्य में
उपलभ्ध है । पद्यार्थ इस प्रकार है—